श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 37

 
श्लोक
मातुस्त्वतितरां पुत्रे स्‍नेहो मोहसमुद्भ‍व: ।
कृतद्युते: सपत्नीनां प्रजाकामज्वरोऽभवत् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
मातु:—माता का; तु—भी; अतितराम्—अत्यधिक; पुत्रे—पुत्र के लिए; स्नेह:—वत्सलता; मोह—अविद्यावश; समुद्भव:—उत्पन्न; कृतद्युते:—कृतद्युति की; सपत्नीनाम्—सौतों का; प्रजा-काम—पुत्रेच्छा का; ज्वर:—ताप, ज्वर; अभवत्—था ।.
 
अनुवाद
 
 पिता की ही भाँति माँ का भी आकर्षण एवं स्नेह पुत्र के प्रति बढ़ता गया। कृतद्युति के पुत्र को देख देख कर राजा की अन्य पत्नियाँ पुत्र की कामना से अत्यधिक क्षुब्ध रहने लगीं, मानो उन्हें उच्च ज्वर हो।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥