श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 6

 
श्लोक
वृत्रस्तु स कथं पाप: सर्वलोकोपतापन: ।
इत्थं द‍ृढमति: कृष्ण आसीत्सङ्ग्राम उल्बणे ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
वृत्र:—वृत्रासुर; तु—लेकिन; स:—वह; कथम्—किस प्रकार; पाप:—(आसुरी शरीर प्राप्त करने में) यद्यपि पापी; सर्व लोक—तीनों लोकों का; उपतापन:—कष्ट का कारण; इत्थम्—ऐसा; दृढ-मति:—दृढ़ बुद्धि; कृष्णे—कृष्ण में; आसीत्—था; सङ्ग्रामे उल्बणे—युद्ध की ज्वाला में ।.
 
अनुवाद
 
 वृत्रासुर युद्ध की धधकती ज्वाला में स्थित था और पापी असुर अन्यों को सदैव कष्ट तथा चिन्ता पहुँचाने के लिए कुख्यात था। ऐसा असुर किस प्रकार इतना बड़ा कृष्ण भक्त हो सका?
 
तात्पर्य
 यह बतलाया जा चुका है कि किस प्रकार लाखों तथा करोड़ों व्यक्तियों में से कोई एक विरला ही शुद्ध भक्त अर्थात् नारायण-परायण होता है। अत: परीक्षित महाराज को आश्चर्य
हो रहा था कि वह वृत्रासुर, जिसका ध्येय अन्यों को कष्ट तथा चिंता पहुँचाना था, युद्धभूमि में भी ऐसे भक्तों में से एक था। वृत्रासुर की उन्नति का क्या कारण था?
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥