श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
ऊचतुर्मृतकोपान्ते पतितं मृतकोपमम् ।
शोकाभिभूतं राजानं बोधयन्तौ सदुक्तिभि: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; ऊचतु:—वे बोले; मृतक—मृत शरीर; उपान्ते—निकट; पतितम्—गिरा हुआ; मृतक-उपमम्—शव के तुल्य; शोक-अभिभूतम्—शोक से अत्यधिक संतप्त; राजानम्—राजा को; बोधयन्तौ— उपदेश देकर; सत्-उक्तिभि:—उपदेशों से, जो क्षणिक नहीं वरन् वास्तविक हैं ।.
 
अनुवाद
 
 श्री शुकदेव गोस्वामी बोले—जब राजा चित्रकेतु शोकग्रस्त होकर अपने पुत्र के शव के निकट पड़े मृतप्राय हुए थे तो नारद तथा अंगिरा नामक दो महर्षियों ने उन्हें आध्यात्मिक चेतना के सम्बन्ध में इस प्रकार उपदेश दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥