श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश  »  श्लोक 2

 
श्लोक
कोऽयं स्यात्तव राजेन्द्र भवान् यमनुशोचति ।
त्वं चास्य कतम: सृष्टौ पुरेदानीमत: परम् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
क:—कौन; अयम्—यह; स्यात्—है; तव—तुम्हारे लिए; राज-इन्द्र—राजाओं में श्रेष्ठ; भवान्—आप; यम्—जिसको; अनुशोचति—शोक कर रहे हो; त्वम्—तुम; च—और; अस्य—उसका (शव का); कतम:—कौन; सृष्टौ—जन्म में; पुरा—गत; इदानीम्—इस समय; अत: परम्—अत: ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्! जिस शव के लिए तुम शोक कर रहे हो उसका तुमसे और तुम्हारा उसके साथ क्या सम्बन्ध है? तुम कह सकते हो कि इस समय तुम पिता हो और वह पुत्र है, किन्तु क्या तुम सोचते हो कि यह सम्बन्ध पहले भी था? क्या सचमुच अब भी यह सम्बन्ध है? क्या यह भविष्य में भी बना रहेगा?
 
तात्पर्य
 नारद तथा अंगिरा मुनि ने जो उपदेश दिये वे मोहग्रस्त बद्धजीव के लिए वास्तविक आध्यात्मिक उपदेश हैं। यह संसार अस्थायी है, किन्तु अपने पूर्वकर्मों के कारण हम यहाँ आते हैं और शरीर धारण करते हैं और समाज, मैत्री, प्रेम, राष्ट्रीयता
तथा जन-समूह के रूप में अस्थायी सम्बन्धों की सृष्टि करते हैं, जो मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाते हैं। ये अस्थायी सम्बन्ध न तो भूतकाल में थे और न भविष्य में रहेंगे। अत: वर्तमान समय में ये तथाकथित सम्बन्ध छलावा हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥