श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश  »  श्लोक 25

 
श्लोक
अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मक: ।
देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृत: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
अयम्—यह; हि—निश्चय ही; देहिन:—जीवात्मा का; देह:—शरीर; द्रव्य-ज्ञान-क्रिया-आत्मक:—भौतिक तत्त्वों, ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों समेत; देहिन:—जीवात्मा का; विविध—नाना प्रकार का; क्लेश—कष्ट; सन्ताप—तथा पीड़ा का; कृत्—कारण; उदाहृत:—घोषित किया जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 देहात्मबुद्धि के कारण जीवात्मा अपने शरीर में, जो भौतिक तत्त्वों, पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा मन समेत पाँच कर्मेन्द्रियों का संपुंज है, मग्न रहता है। मन के कारण जीवात्मा को तीन प्रकार के—अधिभौतिक, अधिदैविक तथा अध्यात्मिक-ताप सहने पड़ते हैं। अत: यह शरीर समस्त दुखों का मूल है।
 
तात्पर्य
 पंचम स्कंध (५.५.४) में ऋषभदेव ने अपने पुत्रों को उपदेश देते हुए कहा है— असन्नपि क्लेशद आस देह:—अनित्य होते हुए भी यह शरीर संसार के समस्त दुखों का कारण है। जैसाकि पिछले श्लोक में बताया जा चुका है, सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि मनोरथ पर आधारित है। मन कभी-कभी हमें सोचने के लिए प्रेरित करता है कि यदि हम एक वाहन (कार) खरीद लें तो हम भौतिक तत्त्वों का यथा पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि का लोहे, प्लास्टिक तथा पेट्रोल आदि के मिले जुले रूप से सुखोपभोग कर सकते हैं। पाँच भौतिक तत्त्वों (पंच-भूत) तथा आँख, कान और जिव्हा आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियों व पाँच कर्मेन्द्रियों तथा हाथ और पांव के बल पर कार्य करने के कारण हम भौतिक स्थिति प्राप्त करने में उलझ जाते हैं। इस प्रकार हमें तापत्रय—अध्यात्मिक, अधिदैविक तथा अधिभौतिक सहने होते हैं। मन केन्द्र बिन्दु है क्योंकि उसी से सारी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। ज्योंही वह भौतिक वस्तु मिल जाती है, तो मन पर उसका प्रभाव पड़ता है और हम कष्ट पाते हैं। उदाहरणार्थ, पाँच तत्त्वों, पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा पाँच कर्मेन्द्रियों के बल पर हम एक बहुत सुन्दर कार बनाते हैं, किन्तु जब किसी दुर्घटना में वह कार नष्ट हो जाती है, तो मन को पीड़ा पहुँचती है, जिसके माध्यम से जीवात्मा को कष्ट होता है।
तथ्य तो यह है कि जीवात्मा मन के साथ सांठ-गांठ करकेभौतिक स्थिति उत्पन्न करता है। चूँकि पदार्थ विनाशशील है, अत: भौतिक स्थिति के कारण जीवात्मा कष्ट भोगता है। अन्यथा जीवात्मा समस्त प्रकार से सभी भौतिक स्थितियों से विरक्त है। जब मनुष्य ब्रह्म पद को प्राप्त होता है, जो आध्यात्मिक जीवन का सत्य है, तो उसे अच्छी तरह पता रहता है कि वह आत्मा है (अहं ब्रह्मास्मि) अत: उसे शोक या गर्व प्रभावित नहीं करते। भगवान् ने भगवद्गीता (१८.५४) में कहा है—ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति “जो इस प्रकार दिव्य पद पर स्थित होता है उसे तत्काल परब्रह्म की अनुभूति होती है और पूर्णरूपेण प्रसन्न हो जाता है। वह न शोक करता है, न किसी वस्तु की इच्छा रखता है।” अन्यत्र उन्होंने भगवद्गीता (१५.७) में ही कहा है—

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।

मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

“इस बद्ध जगत में जीवात्माएँ मेरे ही शाश्वत भिन्न अंश हैं। बद्ध दशा के कारण वे मन समेत छह इन्द्रियों के साथ घोर संघर्ष कर रही हैं।” जीवात्मा निस्सन्देह भगवान् का अंश रूप है और भौतिक स्थितियों से प्रभावित नहीं होता, किन्तु मन (मन:) प्रभावित होता है, अत: इन्द्रियाँ प्रभावित होती हैं और जीवात्मा इस जगत में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता रहता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥