श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश  »  श्लोक 3

 
श्लोक
यथा प्रयान्ति संयान्ति स्रोतोवेगेन बालुका: ।
संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते तथा कालेन देहिन: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस प्रकार; प्रयान्ति—विलग होते; संयान्ति—पास पास आते हैं; स्रोत:-वेगेन—लहरों के वेग से; बालुका:— बालू के सूक्ष्म कण; संयुज्यन्ते—परस्पर जुड़ते; वियुज्यन्ते—पृथक् होते हैं; तथा—उसी प्रकार; कालेन—काल के द्वारा; देहिन:—देहधारी जीवात्माएँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्! जिस प्रकार बालू के छोटे-छोटे कण लहरों के वेग से कभी एक दूसरे के निकट आते हैं और कभी विलग हो जाते हैं, उसी प्रकार से देहधारी जीवात्माएँ काल के वेग से कभी मिलती हैं, तो कभी बिछुड़ जाती हैं।
 
तात्पर्य
 बद्धजीव के अज्ञान का कारण उसकी देहात्मबुद्धि है। यह देह भौतिक है, किन्तु देह के भीतर आत्मा है। यही आत्म-ज्ञान है। दुर्भाग्यवश सांसारिक मोहवश जो व्यक्ति अज्ञान में रहता है, वह देह को ही आत्मा मान लेता है। उसे यह ज्ञात नहीं हो पाता कि देह पदार्थ-स्वरूप है। ये देहें बालू के छोटे-छोटे कणों के समान एक दूसरे के निकट आती और पुन: कालवेग से पृथक् हो जाती हैं। लोग झूठे ही संयोग या वियोग के लिए शोक करते हैं। जब तक वे इसे समझ नहीं लेते तब तक सुख का प्रश्न ही नहीं उठता। अत: भगवद्गीता (२.१३) में भगवान् श्रीकृष्ण का सर्वप्रथम उपदेश यही है—
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

“जिस प्रकार बद्धजीव को इस देह में क्रम से बालपन, यौवन और वृद्धावस्था की प्राप्ति होती है, उसी तरह मृत्यु होने पर अन्य देह की प्राप्ति होती है। स्वरूपसिद्ध धीर पुरुष इस से मोहित नहीं होता।” हम देह नहीं हैं वरन् हम तो इस देह में बन्दी बने आध्यत्मिक जीव हैं। हमारी वास्तविक रुचि इस सामान्य तथ्य को जान लेने में है। तभी हम आगे आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं। अन्यथा यदि हम देहात्म-बुद्धि में बने रहते हैं। तो हमारा दयनीय भौतिक अस्तित्व सदा-सर्वदा के लिए बना रहेगा। हम शान्ति तथा सुख के लिए कितना ही राजनीतिक तालमेल, सामाजिक कल्याणकार्य, चिकित्सा-सहायता तथा अन्य कार्यक्रम क्यों न बना लें, यह कभी नहीं चल सकता। हमें एक-एक करके भौतिक जीवन के सभी कष्ट उठाने ही होंगे। इसलिए भौतिक जीवन को दु:खालयं शाश्वतं अर्थात् दुखों का आगार कहा गया है।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥