श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश  »  श्लोक 5

 
श्लोक
वयं च त्वं च ये चेमे तुल्यकालाश्चराचरा: ।
जन्ममृत्योर्यथा पश्चात् प्राङ्‌नैवमधुनापि भो: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
वयम्—हम (बड़े-बड़े साधु तथा मंत्री एवं राजा के अनुयायी); च—तथा; त्वम्—तुम; च—भी; ये—जो; च—भी; इमे—ये; तुल्य-काला:—समकालीन; चर-अचरा:—समस्त स्थावर तथा जंगम; जन्म—जन्म; मृत्यो:—(तथा) मृत्यु; यथा—जिस प्रकार; पश्चात्—बाद में; प्राक्—पहले; न—नहीं; एवम्—इस प्रकार; अधुना—इस समय; अपि—यद्यपि; भो:—हे राजन्! ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्! तुम तथा हम अर्थात् तुम्हारे परामर्शदाता, पत्नियाँ एवं मंत्री और समस्त सम्पूर्ण जगत में इस समय जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सभी क्षणभंगुर हैं। यह स्थिति न तो हमारे जन्म के पूर्व थी और न हमारी मृत्यु के पश्चात् रहेगी। अत: इस समय हमारी स्थिति क्षणिक (अस्थायी) है, यद्यपि वह मिथ्या नहीं है।
 
तात्पर्य
 मायावादी दार्शनिकों का कहना है : ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या—ब्रह्म अर्थात् जीव तो सत्य है, किन्तु उसकी वर्तमान दैहिक स्थिति मिथ्या है। वैष्णव दर्शन के अनुसार वर्तमान स्थिति क्षणिक है, मिथ्या नहीं। यह स्वप्न-तुल्य है। मनुष्य के सो जाने से पूर्व स्वप्न का अस्तित्व नहीं होता न ही उसके जग जाने के पश्चात् रहता है। स्वप्न का अस्तित्व तो इन दोनों स्थितियों के मध्य में रहता है, अत:
यह अस्थायी होने के कारण मिथ्या है। इसी प्रकार यह समस्त भौतिक सृष्टि जिसमें हमारी अपनी सृष्टि तथा दूसरों की सृष्टियाँ सम्मिलित हैं, अस्थायी हैं। स्वप्न की स्थिति के लिए न तो सोने के पूर्व और न जागने के पश्चात् ही हम शोक व्यक्त करते हैं। स्वप्न की स्थिति को अथवा स्वप्न जैसी स्थिति को हमें वास्तविक नहीं मान लेना चाहिए, न ही उसके लिए शोक करना चाहिए। यही वास्तविक ज्ञान हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥