श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश  »  श्लोक 6

 
श्लोक
भूतैर्भूतानि भूतेश: सृजत्यवति हन्ति च ।
आत्मसृष्टैरस्वतन्त्रैरनपेक्षोऽपि बालवत् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
भूतै:—कुछ जीवों से; भूतानि—अन्य जीवात्माओं को; भूत-ईश:—सबके स्वामी, श्रीभगवान्; सृजति—उत्पन्न करता है; अवति—पालन करता है; हन्ति—मारता है; च—भी; आत्म-सृष्टै:—अपने द्वारा उत्पन्न; अस्वतन्त्रै:—पराधीन; अनपेक्ष:— (सृष्टि में) न रुचि रखने से; अपि—यद्यपि; बाल-वत्—बालक के समान ।.
 
अनुवाद
 
 सबों के स्वामी तथा प्रत्येक वस्तु के मालिक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् निश्चय ही क्षणिक दृश्य जगत में तनिक भी रुचि नहीं रखते। तो भी जिस प्रकार समुद्र के किनारे पर बैठा हुआ बालक अनचाही किसी न किसी वस्तु (घरौंदा) को बनाता है उसी प्रकार से भगवान् प्रत्येक वस्तु को अपने वश में रखते हुए सृजन, पालन तथा संहार का कार्य करते रहते हैं। वे पिता से पुत्र उत्पन्न कराकर सृष्टि करते हैं, प्रजा के कल्याण हेतु सरकार या राजा नियुक्त करके पालन करते हैं तथा सर्प जैसे माध्यमों से संहार करते हैं। सृजन, पालन तथा संहारकर्ता माध्यमों की कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं होती, किन्तु माया के सम्मोहन से वे अपने को कर्त्ता, पालक तथा संहारक मान बैठते हैं।
 
तात्पर्य
 किसी में यह सामर्थ्य नहीं कि वह वास्तव में स्वतंत्र रूप से सृजन, पालन तथा संहार कर सके। अत: भगवद्गीता (३.२७) का कथन है—
प्रकृते: क्रियामाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।

अहंकार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

“प्रकृति के तीन गुणों से भ्रमित होकर मोहग्रस्त जीवात्मा अपने को ही कर्त्ता मान बैठता है, जब कि समस्त कर्म वास्तव में प्रकृति द्वारा सम्पादित होते हैं।” श्रीभगवान् के निर्देश से प्रकृति गुणों के अनुसार जीवात्माओं को सृजन, पालन तथा संहार के लिए प्रेरित करती है। किन्तु परमात्मा तथा उसकी प्रतिनिधि प्रकृति से अनजान रहकर जीवात्मा अपने को कर्त्ता मान बैठता है। वास्तव में वह कर्त्ता है ही नहीं। मनुष्य को परमकर्त्ता परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में उसकी आज्ञाओं का पालन करना चाहिए। इस समय संसार में जो असन्तोष छाया हुआ है, उसका कारण नेताओं की अविद्या है, जो यह भूल जाते हैं कि श्रीभगवान् ने उन्हें कार्य करने के लिए भेजा है। चूँकि उन्हें ईश्वर ने नियुक्त किया है इसलिए उन्हें चाहिए कि उनसे परामर्श लेकर तदनुसार कार्य करें। परामर्श के लिए भगवद्गीता नामक ग्रन्थ है, जिस में परमेश्वर ने सारे निर्देश दे रखे हैं। अत: जिन्हें ईश्वर ने सृजन, पालन तथा संहार कार्यों के लिए नियुक्त कर रखा है, उन्हें चाहिए कि ईश्वर से परामर्श लेकर उसी के अनुसार कार्य करें। तब प्रत्येक व्यक्ति सन्तुष्ट रहेगा और कोई अव्यवस्था नहीं फैलेगी।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥