श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 24

 
श्लोक
देहेन्द्रियप्राणमनोधियोऽमी
यदंशविद्धा: प्रचरन्ति कर्मसु ।
नैवान्यदा लौहमिवाप्रतप्तं
स्थानेषु तद् द्रष्ट्रपदेशमेति ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
देह—शरीर; इन्द्रिय—इन्द्रिय; प्राण—प्राणशक्ति; मन:—मन; धिय:—तथा बुद्धि; अमी—ये सब; यत्-अंश-विद्धा:— ब्रह्म या परमेश्वर की किरणों से प्रभावित; प्रचरन्ति—फैलती हैं; कर्मसु—विभिन्न गतिविधियों में; न—नहीं; एव— निस्सन्देह; अन्यदा—अन्य अवसरों पर; लौहम्—लोहा; इव—के समान; अप्रतप्तम्—(अग्नि से) अतप्त; स्थानेषु—उन स्थितियों में; तत्—वह; द्रष्टृ-अपदेशम्—किसी दृष्ट वस्तु का नाम; एति—प्राप्त करता है ।.
 
अनुवाद
 
 जिस प्रकार अग्नि के सम्पर्क से तप्त हुआ लोहा भस्म कर देने में समर्थ है उसी प्रकार शरीर, इन्द्रियाँ, प्राणशक्ति, मन तथा बुद्धि पदार्थ के पिण्ड मात्र होते हुए भी श्रीभगवान् द्वारा चेतना के कणमात्र से पूरित होने पर अपने-अपने कार्य करने लगते हैं। जिस प्रकार अग्नि में तप्त हुए बिना लोहा कुछ भी जला पाने में अशक्त रहता है उसी प्रकार ये शारीरिक इन्द्रियाँ परमेश्वर की कृपादृष्टि के बिना कार्य नहीं कर सकतीं।
 
तात्पर्य
 तपाकर लाल किया गया लोहा जला सकता है, किन्तु वह मूल अग्नि को भस्म नहीं कर सकता। अत: ब्रह्म के सूक्ष्म कण की चेतना परब्रह्म की शक्ति पर पूर्णतया आश्रित है। भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण का कथन है—मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च—बद्धजीव मुझी से स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति प्राप्त करता है। कार्य करने की शक्ति परमेश्वर से प्राप्त होती है और जब भगवान् शक्ति वापस ले लेते हैं, तो बद्धजीव की इन्द्रियों में कार्य करने की शक्ति नहीं रह जाती। शरीर में पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा मन के अतिरिक्त पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं, किन्तु वास्तव में ये पदार्थ के खण्डों के सदृश हैं। उदाहरणस्वरूप, मस्तिष्क पदार्थ के अतिरिक्त कुछ नहीं है, किन्तु जब वही श्रीभगवान् की शक्ति से विद्युन्मय हो जाता है, तो कार्य कर सकता है, जिस प्रकार अग्नि के सम्पर्क में आकर लाल होने पर
लोहा जला सकने में समर्थ है। हमारे जगते रहने या स्वप्न देखते समय भी मस्तिष्क कार्य कर सकता है, किन्तु हमारे संज्ञाशून्य होने पर यह निष्क्रिय रहता है या प्रगाढ़ निद्रा के समय यह निष्क्रिय रहता है। चूंकि मस्तिष्क पदार्थ का एक पिण्ड है, इसमें कार्य करने की स्वतंत्र सक्षमता नहीं होती है वह तभी कार्य कर सकता है जब उस पर ब्रह्म या परब्रह्म स्वरूप श्रीभगवान् की कृपादृष्टि होती है। यही वह विधि है, जिससे यह समझा जा सकता है कि परब्रह्म श्रीकृष्ण सर्वत्र व्याप्त हैं। जैसे सूर्य मण्डल में सूर्यदेव की उपस्थिति के कारण धूप दिखती है। परमेश्वर को हृषीकेश कहा जाता है। वे ही इन्द्रियों के एकमात्र संचालक हैं। जब तक उनकी शक्ति प्राप्त नहीं होती, हमारी इन्द्रियाँ कार्य नहीं कर सकतीं। दूसरे शब्दों में, ईश्वर ही एकमात्र द्रष्टा, कर्ता, श्रोता तथा नियन्ता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥