श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 27

 
श्लोक
चित्रकेतुस्तु तां विद्यां यथा नारदभाषिताम् ।
धारयामास सप्ताहमब्भक्ष: सुसमाहित: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
चित्रकेतु:—राजा चित्रकेतु ने; तु—निस्सन्देह; ताम्—उस; विद्याम्—दिव्य ज्ञान को; यथा—जिस प्रकार; नारद भाषिताम्—परम साधु नारद द्वारा उपदेश दिया गया; धारयाम् आस—जाप किया; सप्त-अहम्—लगातार एक सप्ताह तक; अप्-भक्ष:—केवल जल पीकर; सु-समाहित:—अत्यन्त ध्यानपूर्वक ।.
 
अनुवाद
 
 केवल जल पीकर उपवास करते हुए राजा चित्रकेतु ने नारद मुनि द्वारा दिये गये मंत्र का एक सप्ताह तक अत्यन्त ध्यानपूर्वक लगातार जप किया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥