श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 44

 
श्लोक
न हि भगवन्नघटितमिदं
त्वद्दर्शनान्नृणामखिलपापक्षय: ।
यन्नाम सकृच्छ्रवणात्
पुक्कशोऽपि विमुच्यते संसारात् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निस्सन्देह; भगवन्—हे भगवान्; अघटितम्—जो कभी न हुआ हो; इदम्—यह; त्वत्—तुम्हारे; दर्शनात्—दर्शन से; नृणाम्—समस्त मनुष्यों का; अखिल—सम्पूर्ण; पाप—पापों का; क्षय:—संहार; यत्-नाम—जिसका नाम; सकृत्—केवल एक बार; श्रवणात्—सुनने से; पुक्कश:—निम्नतम जाति, चण्डाल; अपि—भी; विमुच्यते—छूट जाता है; संसारात्—इस संसार के बन्धन से ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्! आपके दर्शनमात्र से किसी के लिए भी समस्त भौतिक कल्मषों से तुरन्त मुक्त हो जाना असम्भव नहीं है। आपको प्रत्यक्ष देखने की बात तो एक ओर रही; आपके पवित्र नाम को एक बार सुन लेने से ही चण्डाल तक समस्त भौतिक कल्मष से विमुक्त हो जाते हैं। ऐसी दशा में आपके दर्शनमात्र से ऐसा कौन है, जो भौतिक कल्मष से मुक्त नहीं हो पायेगा?
 
तात्पर्य
 जैसाकि श्रीमद्भागवत (९५.१६) में कहा गया है—यन्नाम श्रुतिमात्रेण पुमान् भवति निर्मल:—ईश्वर का पवित्र नाम सुनने मात्र से ही मनुष्य तुरन्त शुद्ध हो जाता है। अत: इस कलियुग में, जबकि सभी मनुष्य कल्मषग्रस्त हैं, भगवन्नाम जप को सुधार का एकमात्र साधन संस्तुत किया गया है।
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।

कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥

“कलह तथा छल-छद्म के इस युग में उद्धार का एकमात्र साधन भगवान् के पवित्र नाम का जप है। इसका कोई अन्य साधन नहीं है, कोई अन्य साधन नहीं, कोई अन्य साधन नहीं है।” (बृहन्नारदीय पुराण)। पाँच सौ वर्ष पूर्व चैतन्य महाप्रभु ने पवित्र नाम के इस जप का सूत्रपात किया और हम कृष्णभावनामृत आन्दोलन के माध्यम से अब यह देख रहे हैं कि निम्न श्रेणी के व्यक्ति भगवान् के पवित्र नाम को सुनने मात्र से ही समस्त पापकर्मों से छुटकारा पा रहे हैं। यह संसार पापकर्मों का परिणाम है। इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति धिक्कारणीय है, तो भी जिस प्रकार कैदियों की भिन्न भिन्न श्रेणियाँ होती हैं उसी प्रकार मनुष्यों की भी विभिन्न श्रेणियाँ हैं। वे जीवन की समस्त अवस्थाओं में दुख भोग रहे हैं। सांसारिक दुखों को रोकने के लिए हरे कृष्ण सङ्कीर्तन आन्दोलन को या कृष्ण-भावनामृत के जीवन को अपनाना चाहिए।

यहाँ पर कहा गया है यन्नाम सकृच्छ्रवणात्—श्रीभगवान् का पवित्र नाम इतना शक्तिमान है कि अपराधरहित होकर एक बार भी सुनने पर नीच मनुष्य भी पवित्र हो सकते हैं (किरात-हूणान्ध्र पुलिन्द पुल्कशा:)। ऐसे मनुष्य जो चण्डाल कहलाते हैं, वे शूद्रों से भी नीच हैं, किन्तु वे भी पवित्र नाम के श्रवणमात्र से पवित्र किये जा सकते हैं। हम अपनी वर्तमान स्थिति में भगवान् को मन्दिरों में श्रीविग्रह रूप में प्रत्यक्ष देख सकते हैं। भगवान् के साक्षात् दर्शन की तो बात ही क्या? भगवान् का श्रीविग्रह परमेश्वर से भिन्न नहीं। चूँकि भगवान् हमारे वर्तमान् मोहग्रस्त नेत्रों से नहीं दिखाई पड़ते इसलिए उन्होंने हमारे समक्ष ऐसे रूप में उपस्थित होना स्वीकार किया है, जिसे हम देख सकें। अत: मन्दिर में स्थित श्रीविग्रह को भौतिक नहीं समझना चाहिए। श्रीविग्रह को भोजन भेंट करके तथा उसे अलंकृत करके उसकी सेवा करने से मनुष्य को वही फल प्राप्त होता है, जो वैकुण्ठ में साक्षात् भगवान् की सेवा से प्राप्त होता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥