श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 55

 
श्लोक
येन प्रसुप्त: पुरुष: स्वापं वेदात्मनस्तदा ।
सुखं च निर्गुणं ब्रह्म तमात्मानमवेहि माम् ॥ ५५ ॥
 
शब्दार्थ
येन—जिसके (परब्रह्म) द्वारा; प्रसुप्त:—सोया हुआ; पुरुष:—व्यक्ति; स्वापम्—स्वप्न के विषय को; वेद—जानता है; आत्मन:—अपना; तदा—उस समय; सुखम्—सुख; च—भी; निर्गुणम्—भौतिक परिवेश से किसी प्रकार के सम्पर्क से रहित, सम्पर्कहीन; ब्रह्म—परमात्मा; तम्—उसको; आत्मानम्—सर्वव्यापी; अवेहि—जानो; माम्—मुझको ।.
 
अनुवाद
 
 तुम मुझे परब्रह्म जानो, जो सर्वव्यापी परमात्मा है और जिसके माध्यम से सुप्त जीवात्मा अपनी सुप्तावस्था तथा इन्द्रियातीत सुखों का अनुभव कर सकता है। कहने का तात्पर्य यह है। कि सुप्त जीवात्माओं की गतिविधियों का कारण मैं ही हूँ।
 
तात्पर्य
 जब जीवात्मा मिथ्या अहंकार से मुक्त हो जाता है, तो वह ईश्वर के अंश रूप में, अर्थात् आत्मा रूप में अपनी श्रेष्ठ स्थिति को समझता है। फलत: सुप्तावस्था में भी जीवात्मा ब्रह्म
के कारण सुख का अनुभव कर सकता है। भगवान् का कथन है कि वह ब्रह्म, वह परमात्मा तथा वह भगवान् मैं ही हूँ। श्रील जीव गोस्वामी ने अपने ग्रंथ क्रम सन्दर्भ में ऐसा लिखा है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥