श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 8

 
श्लोक
एवं योनिगतो जीव: स नित्यो निरहङ्‌कृत: ।
यावद्यत्रोपलभ्येत तावत्स्वत्वं हि तस्य तत् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; योनि-गत:—किसी विशेष योनि में जाकर; जीव:—जीवात्मा; स:—वह; नित्य:—नित्य, शाश्वत; निरहङ्कृत:—अहंकाररहित; यावत्—जब तक; यत्र—जहाँ; उपलभ्येत—वह पाया जा सकता है; तावत्—तब तक; स्वत्वम्—स्व का ज्ञान; हि—निस्सन्देह; तस्य—उसका; तत्—वह ।.
 
अनुवाद
 
 भले ही एक जीवात्मा मर्त्यदेहों के सम्बन्धों के कारण दूसरी जीवात्मा से सम्बद्ध जान पड़े, किन्तु जीवात्मा शाश्वत है। वास्तव में शरीर ही जन्मता है और नष्ट होता है, जीवात्मा नहीं। हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि जीवात्मा की उत्पत्ति या मृत्यु होती है। जीवात्मा का तथाकथित माता-पिता से कोई सम्बन्ध नहीं होता। जब तक जीवात्मा अपने पूर्व कर्म के फलस्वरूप किन्हीं माता-पिता का पुत्र बन कर प्रकट होता है तभी तक माता-पिता द्वारा प्रदत्त शरीर से उसका नाता रहता है। इस प्रकार वह अपने को मिथ्या ही उनका पुत्र मानकर अत्यन्त स्नेह जताता है। मरने के बाद यह सम्बन्ध नष्ट हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य को झूठे ही हर्ष तथा शोक में लीन नहीं होना चाहिए।
 
तात्पर्य
 जब जीवात्मा शरीर के अन्दर रहता है, तो वह अपने को झूठे ही शरीर मान बैठता है यद्यपि वास्तव में ऐसा नहीं है। अपने शरीर एवं तथाकथित माता-पिता के
साथ उसका सम्बन्ध झूठा रहता है, यह मोह-बुद्धि है। जब तक कोई जीवात्मा की वास्तविकता से अवगत नहीं हो लेता मनुष्य इसी मोह में पड़ा रहता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥