श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 17

 
श्लोक
चित्रकेतुरुवाच
प्रतिगृह्णामि ते शापमात्मनोऽञ्जलिनाम्बिके ।
देवैर्मर्त्याय यत्प्रोक्तं पूर्वदिष्टं हि तस्य तत् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
चित्रकेतु: उवाच—राजा चित्रकेतु ने कहा; प्रतिगृह्णामि—अंगीकार करता हूँ; ते—तुम्हारा; शापम्—शाप; आत्मन:— अपने; अञ्जलिना—बद्ध हाथों से; अम्बिके—हे माता; देवै:—देवताओं द्वारा; मर्त्याय—मनुष्य को; यत्—जो; प्रोक्तम्— नियत; पूर्व-दिष्टम्—पूर्वकर्मों के अनुसार पहले से निश्चित; हि—निस्सन्देह; तस्य—उसका; तत्—वह ।.
 
अनुवाद
 
 चित्रकेतु ने कहा—हे माता! मैं अपने हाथ जोड़ कर आपका शाप स्वीकार करता हूँ। मुझे शाप की परवाह नहीं है, क्योंकि मनुष्य के पूर्वकर्मों के अनुसार ही देवताओं द्वारा सुख या दुख प्रदान किये जाते हैं।
 
तात्पर्य
 चूँकि चित्रकेतु भगवान् का भक्त था इसलिए वह माता पार्वती के शाप से तनिक भी विचलित नहीं हुआ। उसे यह भली-भाँति ज्ञात था कि सुख या दुख दैवनेत्र या श्रीभगवान् के दूतों द्वारा पहले से निश्चित विगत कर्मों के फल होते हैं। उसे यह ज्ञात था कि उसने भगवान् शिव या माता पार्वती के चरणकमलों पर किसी प्रकार का पाप नहीं किया था किन्तु फिर भी उसे दण्डित किया गया था जिसका सीधा अर्थ था कि दण्ड तो पूर्वनिश्चित था। अत: राजा ने कोई परवाह नहीं की। भक्त स्वभाव से इतना विनम्र होता है कि जीवन की किसी अवस्था को वह ईश्वर का वरदान मानकर स्वीकार करता है, तत् तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाण: (भागवत १०.१४.८)। भक्त किसी के द्वारा दिये गये दण्ड को ईश्वर का अनुग्रह मान कर स्वीकार करता है। यदि मनुष्य इस प्रकार की विचारधारा से रहे तो वह देखता है कि उसे जो भी असफलताएँ मिलती हैं, वे गत दुष्कर्मों के फलस्वरूप हैं; अत: वह किसी को दोष नहीं देता। उल्टे कष्टों के कारण अधिकाधिक विमल होकर वह भगवान् में आसक्त होता जाता है। अत: कष्टभोग भी पवित्र होने की विधि है।
इस प्रसंग में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर का कथन है कि जिसने कृष्णभक्ति विकसित कर ली है और श्रीकृष्ण से प्रेम करना सीख लिया है उसे कर्म के नियमों के अन्तर्गत सुख तथा दुख नहीं सताते। निस्सन्देह वह कर्म से परे होता है। ब्रह्म-संहिता का कथन है—कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजाम्—भक्त कर्म-फल से इसलिए मुक्त हो जाता है क्योंकि वह भक्ति करता है। इसी सिद्धान्त की पुष्टि भगवद्गीता (१४.२६) में भी हुई है—स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते—जो भक्ति में संलग्न है, वह पहले ही अपने कर्म के फल से मुक्त है, अत: वह तुरन्त ही ब्रह्म-भूत अर्थात् दिव्य हो जाता है। श्रीमद्भागवत (१.२.२१) में भी यह व्यक्त हुआ है—क्षीयन्ते चास्य कर्माणि—प्रेम दशा प्राप्त करने के पूर्व वह कर्म के समस्त फलों से मुक्त हो जाता है।

ईश्वर अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त दयालु एवं वत्सल हैं, फलत: भक्त को किसी भी दशा में कर्मफल नहीं भोगने पड़ते। भक्त कभी स्वर्ग की कामना नहीं करता। भक्त के लिए स्वर्ग, मुक्ति तथा नरक एकसमान हैं क्योंकि वह भौतिक संसार में विभिन्न अवस्थाओं के बीच भेद नहीं करता। वह भगवान् के धाम वापस जाने का सदैव आकांक्षी होता है और वहाँ ईश्वर का पार्षद बनना चाहता है। यह अभिलाषा उसके हृदय में अत्यन्त उत्कट हो उठती है इसलिए इस जीवन में भौतिक परिवर्तनों की परवाह नहीं करता। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की टिप्पणी है कि पार्वती द्वारा चित्रकेतु का शापित होना एक प्रकार से ईश्वर का अनुग्रह माना जाना चाहिए। भगवान् चाहते थे कि चित्रकेतु यथाशीघ्र उनके पास वापस आए, अत: उन्होंने उसके समस्त पूर्वकर्मों के बन्धनों को समाप्त कर दिया। प्रत्येक प्राणी के हृदय में वास करने वाले भगवान् ने पार्वती के हृदय से कार्य करके चित्रकेतु को शाप दिलाया जिससे उसके सारे भौतिक कर्म फल विनष्ट हो जाँए। इस प्रकार अगले जीवन में चित्रकेतु वृत्रासुर हुआ और भगवान् के धाम को वापस गया।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥