श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 18

 
श्लोक
संसारचक्र एतस्मिञ्जन्तुरज्ञानमोहित: ।
भ्राम्यन् सुखं च दु:खं च भुङ्क्ते सर्वत्र सर्वदा ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
संसार-चक्रे—इस संसार रूपी पहिए में; एतस्मिन्—यह; जन्तु:—जीवात्मा; अज्ञान-मोहित:—अज्ञान के कारण मोहग्रस्त; भ्राम्यन्—घूमता हुआ; सुखम्—सुख; च—तथा; दु:खम्—दुख; च—भी; भुङ्क्ते—भोगता है; सर्वत्र—सभी जगह; सर्वदा—सदैव ।.
 
अनुवाद
 
 अज्ञान से मोहग्रस्त होकर यह जीवात्मा इस संसार रूपी जंगल में भटकता रहता है और हर जगह तथा हर समय अपने पूर्वकर्मों के फलस्वरूप सुख तथा दुख पाता रहता है (अत: हे माता! इस घटना के लिए न आप दोषी हैं न मैं)।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (३.२७) में पुष्टि की गई है—
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

“सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा सम्पन्न होते हैं परन्तु गुणों से मोहग्रस्त जीवात्मा अपने को इनका कर्ता मान बैठता है।” वस्तुत: बद्धजीव पूर्णत: भौतिक प्रकृति के वश में रहता है। हर समय यहाँ-वहाँ भटकते हुए उसे पूर्वकर्मों के फल भोगने होते हैं। यह सब प्रकृति के नियमों से घटित होता है, किन्तु मनुष्य मूर्खतावश अपने को कर्ता मान बैठता है, जो कि सत्य नहीं है। कर्म-

चक्र से छूटने के लिए भक्ति-मार्ग या कृष्णभावनामृत ग्रहण करना चाहिए। यही एकमात्र उपाय है। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥