श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 21

 
श्लोक
एक: सृजति भूतानि भगवानात्ममायया ।
एषां बन्धं च मोक्षं च सुखं दु:खं च निष्कल: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
एक:—एक; सृजति—उत्पन्न करता है; भूतानि—विभिन्न प्रकार की जीवात्माओं को; भगवान्—श्रीभगवान्; आत्म- मायया—आत्म स्वरूप शक्तियों से; एषाम्—समस्त बद्धजीवों का; बन्धम्—बद्ध जीवन; च—तथा; मोक्षम्—मुक्त जीवन; च—भी; सुखम्—सुख; दु:खम्—दुख; च—तथा; निष्कल:—भौतिक गुणों से अप्रभावित ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीभगवान् एक हैं। वे भौतिक जगत की स्थितियों से प्रभावित हुए बिना आत्मस्वरूप शक्ति से समस्त जीवों की सृष्टि करते हैं। माया से दूषित होकर जीवात्मा अविद्या को प्राप्त होता है और अनेक प्रकार के बन्धनों में जा पड़ता है। कभी-कभी ज्ञान के कारण जीवात्मा को मुक्ति दी जाती है। सत्व तथा रजो गुणों के कारण उसे सुख तथा दुख मिलते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है कि जीवात्माएँ विभिन्न स्थितियों में क्यों रहती हैं और ऐसा कौन करता है? इसका उत्तर यही है कि भगवान् अकेले ही बिना किसी की सहायता के यह सब करते हैं। ईश्वर की अपनी शक्तियाँ हैं (परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते) और इनमें से उनकी बहिरंगा शक्ति के द्वारा यह जगत एवं बद्धजीवों के नाना प्रकार के सुख-दुख भगवान् की अध्यक्षता में उत्पन्न होते हैं। यह संसार तीन प्रकार के गुणों से युक्त
है—सत्त्व गुण, रजोगुण तथा तमो गुण। भगवान् सत्त्व गुण से संसार का पालन, रजोगुण से उसकी उत्पत्ति और तमोगुण से उसका संहार करते हैं। जीवात्माओं की उत्पत्ति के पश्चात् उनको सुख तथा दुख इन गुणों के संयोग से प्राप्त होते हैं। जब जीवात्माएँ सत्त्व गुण में होती हैं, तो वे सुख का अनुभव करती हैं, रजोगुण में दुख का और तमोगुण में उन्हें इसका ज्ञान ही नहीं रह जाता कि करना क्या है अथवा अच्छा-बुरा होता क्या है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥