श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 31

 
श्लोक
वासुदेवे भगवति भक्तिमुद्वहतां नृणाम् ।
ज्ञानवैराग्यवीर्याणां न हि कश्चिद् व्यपाश्रय: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
वासुदेवे—भगवान् वासुदेव, कृष्ण में; भगवति—भगवान्; भक्तिम्—भक्ति में प्रेम तथा श्रद्धा; उद्वहताम्—धारण करने वालों के लिए; नृणाम्—मनुष्यों का; ज्ञान-वैराग्य—वास्तविक ज्ञान तथा विरक्ति का; वीर्याणाम्—शक्तिमान; न—नहीं; हि—निस्सन्देह; कश्चित्—कुछ भी; व्यपाश्रय:—शरण के रूप में ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वासुदेव कृष्ण की भक्ति में अनुरक्त व्यक्ति स्वभावत: परम ज्ञानी तथा इस संसार से विरक्त रहने वाले होते हैं। अत: ऐसे भक्त न तो इस संसार के तथाकथित सुख में न ही तथाकथित दुख में कोई रुचि रखते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर एक भक्त तथा दिव्य विषय पर मनन करने वाले दार्शनिक का अन्तर दिखाया गया है। भक्त को इस संसार की असत्यता या विनश्वरता को समझने के लिए ज्ञान का अनुशीलन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वासुदेव में विशुद्ध भक्ति के कारण उसमें यह ज्ञान तथा विरक्ति स्वत: प्रकट होती हैं। अन्यत्र श्रीमद्भागवत (१.२.७) में इसकी पुष्टि की गई है—
वासुदेवे भगवति भक्तियोग: प्रयोजित:।

जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥

जो मनुष्य वासुदेव कृष्ण की शुद्ध भक्ति में अनुरक्त होता है, वह स्वत: इस संसार से अवगत हो जाता है, जिसके फलस्वरूप वह स्वभावत: विरक्त हो जाता है। यह विरक्ति उसके उच्च ज्ञान से ही सम्भव है। चिन्तनशील दार्शनिक ज्ञान के अनुशीलन से यह समझने का प्रयास करता है कि यह संसार मिथ्या है, किन्तु भक्त में बिना किसी प्रयास के यह ज्ञान स्वत: प्रकट होता है। मायावादी चिन्तक अपने तथाकथित ज्ञान पर गुमान कर सकते हैं किन्तु वासुदेव को न समझने के कारण (वासुदेव: सर्वम् इति) वे संसार की द्वैतता को नहीं समझ पाते क्योंकि यह वासुदेव की बहिरंगा शक्ति का प्राकट्य है। अत: जब तक तथाकथित ज्ञानी वासुदेव की शरण में नहीं जाते तब तक उनका चिन्तनशील ज्ञान अधूरा रहता है। येऽन्येरविन्दाक्ष विमुक्ति-मानिन:—वे वासुदेव के चरणकमलों की शरण में गये बिना सांसारिक कलुष से मुक्त होना चाहते हैं किन्तु वे वासुदेव के चरणकमलों में शरण नहीं लेते हैं, अत: उनका ज्ञान अशुद्ध है। वे जब सचमुच शुद्ध हो जाते हैं, तो वासुदेव की शरण ग्रहण करते हैं अत: ज्ञानी की अपेक्षा भक्त के लिए परम सत्य को समझ पाना सुगम है क्योंकि ज्ञानी वासुदेव को समझने के लिप मात्र चिन्तन करते हैं। शिवजी ने इस कथन की पुष्टि अगले श्लोक में की है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥