श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 33

 
श्लोक
न ह्यस्यास्ति प्रिय: कश्चिन्नाप्रिय: स्व: परोऽपि वा ।
आत्मत्वात्सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरि: ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निस्सन्देह; अस्य—ईश्वर का; अस्ति—है; प्रिय:—अत्यन्त प्यारा; कश्चित्—कोई; न—नहीं; अप्रिय:—जो प्रिय न हो; स्व:—अपना; पर:—पराया; अपि—भी; वा—या; आत्मत्वात्—आत्मा की भी आत्मा होने से; सर्व भूतानाम्—सभी जीवात्माओं का; सर्व-भूत—सभी जीवात्माओं के लिए; प्रिय:—अत्यधिक प्रिय; हरि:—भगवान् हरि ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् को न कोई अति प्रिय है और न कोई अप्रिय। उनके न तो कोई स्वजन है और न कोई पराया है। वे वास्तव में समस्त जीवों के आत्मा के आत्मा हैं। इस प्रकार वे समस्त जीवों के कल्याणकारी मित्र तथा उन सबों के अत्यन्त प्रिय हैं।
 
तात्पर्य
 श्रीभगवान् का दूसरा स्वरूप समस्त जीवात्माओं का परम आत्मा है। जिस प्रकार ‘स्व’ अत्यन्त प्रिय होता है उसी ‘स्व’ का परम ‘स्व’ और भी अधिक प्रिय होता है। प्रत्येक के लिए समान मित्रवत् परमात्मा का कोई भी शत्रु नहीं हो सकता। भगवान् तथा जीवात्माओं के बीच शत्रुता या मित्रता का भाव माया
के बीच में आ जाने के कारण है। चूंकि भौतिक प्रकृति के तीन प्रकार के गुण यह हस्तक्षेप करते हैं जिसके कारण भिन्न-भिन्न सम्बन्ध उत्पन्न होते हैं। वास्तव में शुद्ध जीवात्मा सदैव ईश्वर को अत्यन्त प्रिय है और उसे भी ईश्वर प्रिय होता है। पक्षपात अथवा शत्रुता का प्रश्न नहीं उठता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥