श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 34-35

 
श्लोक
तस्य चायं महाभागश्चित्रकेतु: प्रियोऽनुग: ।
सर्वत्र समद‍ृक् शान्तो ह्यहं चैवाच्युतप्रिय: ॥ ३४ ॥
तस्मान्न विस्मय: कार्य: पुरुषेषु महात्मसु ।
महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उस (ईश्वर) का; च—तथा; अयम्—यह; महा-भाग:—परम भाग्यशाली; चित्रकेतु:—राजा चित्रकेतु; प्रिय:— प्यारा; अनुग:—आज्ञापालक सेवक; सर्वत्र—सभी जगह; सम-दृक्—समान दृष्टि; शान्त:—अत्यन्त शांत; हि—निस्सन्देह; अहम्—मैं; च—भी; एव—निश्चय ही; अच्युत-प्रिय:—कभी न चूकने वाले भगवान् कृष्ण को प्रिय; तस्मात्—अत:; न—नहीं; विस्मय:—आश्चर्य; कार्य:—करणीय, कार्य; पुरुषेषु—पुरुषों में से; महा-आत्मसु—जो महात्मा है; महा-पुरुष भक्तेषु—भगवान् विष्णु के भक्त; शान्तेषु—शान्त; सम-दर्शिषु—सम-दर्शियों में, सबको समान मानने वाले ।.
 
अनुवाद
 
 यह परम उदार चित्रकेतु ईश्वर का प्रिय भक्त है। यह सभी जीवों का समदर्शी है और आसक्ति तथा घृणा से मुक्त है। इसी प्रकार मैं भी भगवान् नारायण का परम प्रिय हूँ, अत: नारायण के उच्च भक्तों की गतिविधियों को देखकर चकित नहीं होना चाहिए क्योंकि वे आसक्ति तथा द्वेष से मुक्त रहते हैं। वे सदैव शान्त रहते हैं और समदर्शी होते हैं।
 
तात्पर्य
 कहा गया है कि वैष्णवेर क्रिया, मुद्रा विज्ञेय ना बुझय—“परम मुक्त वैष्णवों की गतिविधियों को देखकर किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।” किसी को भगवान् की गतिविधियों तथा भक्तों की गतिविधियों को देखकर गुमराह नहीं होना चाहिए। ईश्वर तथा उनके भक्त दोनों ही मुक्त हैं। वे समान स्तर पर हैं, अन्तर केवल इतना ही है कि ईश्वर स्वामी हैं और भक्तजन दास। गुणात्मक रूप से वे एक ही हैं। भगवद्गीता (९.२९) में भगवान् कहते हैं—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।

ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥

“मैं न तो किसी से द्वेष करता हूँ और न पक्षपात; जीव मात्र में मेरा समभाव है। परन्तु जो प्राणी भक्तिभाव से मेरी सेवा करते हैं, वे मेरे मित्र मुझमें ही स्थित हैं। और मैं भी उनका मित्र हूं। ” भगवान् के इस कथन से स्पष्ट है कि भगवान् को उनके भक्त सदैव अत्यन्त प्रिय हैं। वास्तव में शिव ने पार्वती से यह कहा, “चित्रकेतु तथा मैं दोनों ही भगवान् को परम प्रिय हैं अर्थात् हम दास रूप में समान स्तर पर हैं; हम एक दूसरे के सखा हैं और कभी कभी परिहास भी कर लेते हैं। जब चित्रकेतु मेरे व्यवहार पर जोर से हँसा तो वास्तव में मित्र होने के नाते उसने ऐसा किया, अत: उसे शाप देने की कोई आवश्यकता न थी।” इस प्रकार शिवजी ने अपनी पत्नी पार्वती को यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया कि चित्रकेतु को शाप देकर उन्होंने अच्छा नहीं किया।

जीवन के उच्च स्तर पर भी स्त्री तथा पुरुष में भेद हैं, यहाँ तक कि भगवान् शिव तथा पार्वती में भी। शिवजी तो चित्रकेतु को ठीक से जान पाये किन्तु पार्वती नहीं जान पाईं। अत: जीवन के उच्च स्तरों में भी पुरुष और स्त्री की समझ में अन्तर होता है। यह स्पष्ट शब्दों में कहा जा सकता है कि स्त्री की समझ पुरुष से निम्न कोटि की होती है। अब पाश्चात्य देशों में स्त्री तथा पुरुष को समान मानने के लिए आन्दोलन किया जा रहा है, किन्तु इस श्लोक से पता चलता है कि स्त्री सदैव पुरुष की अपेक्षा कम बुद्धिमान होती है।

यह स्पष्ट है कि चित्रकेतु अपने मित्र शिव की आलोचना इसलिए करना चाहते थे क्योंकि वे अपनी पत्नी को गोद में बैठाये हुए थे। शिव भी चित्रकेतु की आलोचना करना चाहते थे क्योंकि ऊपर से वे महान् भक्त थे और भीतर भीतर विद्याधर लोक की स्त्रियों के साथ सुखोपभोग में रुचि दिखा रहे थे। ये तो मित्रों के पारस्परिक हास-परिहास थे, इसमें चित्रकेतु को पार्वती द्वारा शाप दिये जाने का कोई कारण न था। शिवजी के उपदेश को सुनकर पार्वती अवश्य ही लज्जित हुई होंगी कि उन्होंने चित्रकेतु को असुर बनने का शाप क्यों दिया? माता पार्वती चित्रकेतु की स्थिति नहीं समझ पाई थीं अत: उन्होंने शाप दे दिया। किन्तु शिवजी के वचनों को समझने के बाद वे लज्जित हुईं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥