श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 22

 
श्लोक
श्रीसूत उवाच
तद्विष्णुरातस्य स बादरायणि-
र्वचो निशम्याद‍ृतमल्पमर्थवत् ।
सभाजयन् सन्निभृतेन चेतसा
जगाद सत्रायण सर्वदर्शन: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-सूत: उवाच—श्री सूत गोस्वामी ने कहा; तत्—वे; विष्णुरातस्य—महाराज परीक्षित का; स:—उस; बादरायणि:— शुकदेव गोस्वामी ने; वच:—शब्द; निशम्य—सुनकर; आदृतम्—आदरपूर्ण; अल्पम्—संक्षिप्त; अर्थ-वत्—सप्रयोजन; सभाजयन् सन्—प्रशंसा करते हुए; निभृतेन चेतसा—अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; जगाद—उत्तर दिया; सत्रायण—हे शौनक; सर्व-दर्शन:—सर्वज्ञाता, सर्वदर्शी ।.
 
अनुवाद
 
 श्री सूत गोस्वामी ने कहा—हे महर्षि शौनक! महाराजा परीक्षित को सविनय एवं संक्षेप में आवश्यक विषयों पर बोलते हुए सुनकर सर्वज्ञाता शुकदेव गोस्वामी ने उनके प्रयत्नों की प्रशंसा की और इस प्रकार उत्तर दिया।
 
तात्पर्य
 शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित के प्रश्न की अत्यधिक सराहना की क्योंकि वह संक्षेप में होते हुए भी सारगर्भित जिज्ञासाओं से पूर्ण था। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस बात पर बल देते हैं कि यद्यपि दिति ईर्ष्या से पूर्ण थी, किन्तु उसका हृदय भक्तिमय मनोवृत्ति के कारण शुद्ध
हो चुका था। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यद्यपि कश्यप मुनि परम विद्वान थे और आत्मचेतना में सिद्ध थे, किन्तु तो भी वे सुन्दर पत्नी की उत्प्रेरण के वश में थे। चूँकि इन समस्त प्रश्नों को महाराज परीक्षित ने अत्यन्त संक्षेप में पूछा इसलिए शुकदेव गोस्वामी अति प्रसन्न हुए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥