श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 41

 
श्लोक
शरत्पद्मोत्सवं वक्त्रं वचश्च श्रवणामृतम् ।
हृदयं क्षुरधाराभं स्त्रीणां को वेद चेष्टितम् ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
शरत्—शरद ऋतु में; पद्म—कमल-पुष्प; उत्सवम्—फूलते हुए; वक्त्रम्—मुख; वच:—शब्द; च—भी; श्रवण—कान के लिए; अमृतम्—सुख देने वाले; हृदयम्—हृदय; क्षुर-धारा—छुरे की धार; आभम्—सदृश; स्त्रीणाम्—स्त्रियों के; क:—कौन; वेद—जानता है; चेष्टितम्—चरित्र को ।.
 
अनुवाद
 
 स्त्री का मुख शरदकालीन खिले हुए कमल-पुष्प के समान आकर्षक तथा सुन्दर होता है। उसके शब्द अत्यन्त मधुर और कानों को प्रिय लगने वाले होते हैं, किन्तु यदि उसके हदय का अध्ययन किया जाये, तो पता चलेगा कि वह छुरे की धार के समान अत्यन्त पैना है। भला ऐसा कौन है, जो स्त्री के कार्यकलापों को जान सके?
 
तात्पर्य
 कश्यप मुनि ने भौतिक दृष्टि से स्त्री का बहुत सुन्दर चित्र खींचा है। स्त्रियाँ अपनी सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध हैं और तरुणावस्था में, विशेष रूप से सोलह या सत्रह वर्ष की आयु में, वे पुरुषों के लिए अत्यधिक आकर्षक होती हैं। इसलिए स्त्री के मुख की तुलना शरद्कालीन कमल-पुष्प से की गईं है। जिस प्रकार कमल का पुष्प शरद् में अत्यन्त सुन्दर लगता है उसी प्रकार से तरुणावस्था को प्राप्त स्त्री भी अत्यन्त आकर्षक होती है। संस्कृत भाषा में स्त्री की वाणी को नारी स्वर कहते हैं क्योंकि सामान्यत: वह गाती है और उसका गायन आकर्षक होता है। आज- कल तो सिने-तारिकाओं का ही स्वागत होता है। उनमें से कुछ तो मात्र गायन के बल पर प्रभूत धन कमाती हैं। इसलिए, जैसाकि श्री चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा है, स्त्री का संगीत घातक है क्योंकि इससे संन्यासी उसका शिकार हो सकता है। संन्यास का अर्थ स्त्री-संग का परित्याग है, किन्तु यदि कोई संन्यासी स्त्री की वाणी सुनता है और उसके सुन्दर मुख को देखता है, तो वह निश्चित रूप से उसकी ओर आकृष्ट होता है और उसका पतन हो जाता है। ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। यहाँ तक मुनि विश्वामित्र भी मेनका के शिकार हुए। अत: जो आध्यात्मिक उन्नति करना चाहता है उसे विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए कि वह न तो स्त्री का मुख देखे और न उसकी वाणी सुने। स्त्री के मुख को देखना और उसकी सुन्दरता की प्रशंसा करना या उसकी वाणी सुनकर उसके गायन की प्रशंसा करना ब्रह्मचारी या संन्यासी का निश्चित पतन है। अत: कश्यप मुनि द्वारा स्त्री के अंगों का वर्णन अत्यन्त शिक्षाप्रद है।
यदि स्त्री के शरीर के अंग सुन्दर हैं, उसका मुख आकर्षक और वाणी मधुर है, तो वह पुरुष के लिए जाल के समान है। शास्त्रों का उपदेश है कि यदि ऐसी स्त्री पुरुष की सेवा के लिए आए तो उसे घास से ढका हुआ अन्धकूप समझना चाहिए। खेतों के बीच ऐसे अनेक कुँए होते हैं और मनुष्य उनसे परिचित न होने के कारण उनमें गिर जाते हैं। इस प्रकार ऐसे बहुत से निर्देश हैं। चूँकि संसार के सारे आकर्षण स्त्री के आकर्षण पर आधारित हैं, अत: कश्यपमुनि ने सोचा कि ऐसी स्थिति में भला स्त्री के हृदय को कौन जान सकता है? चाणाक्य पण्डित का भी उपदेश है—

विश्वासो नैव कर्तव्य: स्त्रीषु राजकुलेषु च—“दो प्रकार के व्यक्तियों पर कभी विश्वास न करे— राजनीतिज्ञ तथा स्त्री।” ये शास्त्रों की आधिकारिक शिक्षाएँ हैं, अत: स्त्रियों के साथ उठने-बैठने में विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए।

कभी कभी हमारे कृष्णभावनामृत आन्दोलन की आलोचना की जाती है कि इसमें स्त्री तथा पुरुष मिले-जुले रहते हैं। किन्तु कृष्णभक्ति तो हर एक के लिए होती है चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है—स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्राश्तेऽपियान्ति परां गतिम्—चाहे स्त्री हो, शूद्र या वैश्य, (ब्राह्मण तथा क्षत्रिय होने को छोड़ दें), प्रत्येक जीव भगवान् के धाम वापस जाने के लिए उपयुक्त है यदि वह अपने गुरु तथा शास्त्र के उपदेशों का कठोरता से पालन करता है। अत: हम कृष्णभावनामृत आन्दोलन के समस्त सदस्यों से, चाहे स्त्री हों या पुरुष, यह आग्रह करेंगे कि वे भौतिक शरीर के प्रति आकृष्ट न होकर केवल श्रीकृष्ण के प्रति आकृष्ट हों। तभी सब कुछ ठीक रहेगा, अन्यथा भय बना रहेगा।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥