श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 42

 
श्लोक
न हि कश्चित्प्रिय: स्त्रीणामञ्जसा स्वाशिषात्मनाम् ।
पतिं पुत्रं भ्रातरं वा घ्नन्त्यर्थे घातयन्ति च ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निश्चय ही; कश्चित्—कोई; प्रिय:—प्रिय; स्त्रीणाम्—स्त्रियों का; अञ्जसा—वास्तव में; स्व-आशिषा— अपने स्वार्थ के लिए; आत्मनाम्—सर्वाधिक प्रिय; पतिम्—पति को; पुत्रम्—पुत्र को; भ्रातरम्—भाई को; वा—अथवा; घ्नन्ति—मार डालती हैं; अर्थे—अपने स्वार्थ के लिए; घातयन्ति—वध करवाती हैं; च—भी ।.
 
अनुवाद
 
 अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए स्त्रियाँ मनुष्यों के साथ ऐसा व्यवहार करती हैं मानो वे उनकी सर्वाधिक प्रिय हों, किन्तु वास्तव में उनका कोई प्रिय नहीं होता। स्त्रियों को अति साधु स्वभाव का माना जाता है, किन्तु अपने स्वार्थ के लिए वे अपने पति, पुत्र या भाई की भी हत्या कर सकती हैं या दूसरों से करा सकती हैं।
 
तात्पर्य
 कश्यप मुनि ने स्त्रियों के स्वभाव का अच्छा अध्ययन किया है। स्वभाव से ही स्त्रियाँ स्वार्थी होती हैं, अत: सभी प्रकार से उनकी रक्षी की जानी चाहिए जिससे उनका स्वार्थी होने का यह स्वभाव प्रकट न हो। स्त्रियों को मनुष्यों द्वारा सुरक्षा की आवश्यकता होती है। बचपन में स्त्री की सुरक्षा उसके पिता द्वारा, युवावस्था में उसके पति द्वारा और वृद्धावस्था में उसके पुत्र द्वारा होनी चाहिए। यह मनु का आदेश है। उनका कथन है कि स्त्री को किसी भी अवस्था में स्वतंत्रता नहीं दी जानी चाहिए। स्त्रियों की रक्षा इसलिए की जानी चाहिए कि उनकी स्वार्थपरता प्रकट न हो पाए। इस काल में भी ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिनमें स्त्रियों ने जीवन बीमा का लाभ उठाने के लिए अपने पतियों की हत्याएँ की हैं। यह स्त्रियों की आलोचना नहीं, अपितु उनके स्वभाव का व्यावहारिक अध्ययन है। देहात्मबुद्धि के द्वारा ही स्त्री की या पुरुष की आलोचना की ऐसी सहज वृत्तियों का प्राकट्य होता है। जब किसी स्त्री या पुरुष की आध्यत्मिक चेतना बढ़ जाती है, तो उसकी देहात्मबुद्धि जाती रहती है। हमें समस्त स्त्रियों को आध्यात्मिक इकाइयों (अहम् ब्रह्मास्मि) के रूप में देखना चाहिए जिनका एकमात्र धर्म श्रीकृष्ण को तुष्ट करना है। तब हम पर इस शरीर को धारण करने से उत्पन्न होने वाले प्रकृति के गुणों का प्रभाव नहीं होगा।
कृष्णभावनामृत आन्दोलन इतना लाभप्रद है कि यह भौतिक प्रकृति के कल्मष को, जो देह धारण करने से उत्पन्न होता है, दूर कर सकता है। इसलिए प्रारम्भ में ही भगवद्गीता का यह उपदेश है कि चाहे स्त्री हो या पुरुष, जीव को यह समझ लेना चाहिए कि वह शरीर नहीं वरन् आत्मा है। प्रत्येक मनुष्य को शरीर नहीं वरन् आत्मा के कार्यकलापों में रुचि रखनी चाहिए। चाहे स्त्री हो या पुरुष, जब तक कोई देहात्मबुद्धि से प्रेरित रहता है तब तक सदा ही पथभ्रष्ट होने की सम्भावना बनी रहती है। आत्मा को कभी-कभी पुरुष कहा जाता है क्योंकि चाहे कोई स्त्री वेष में हो या पुरुष वेष में, वह इस भौतिक जगत का सुख उठाना चाहता है और जिसमें सुखोपभोग की यह वृत्ति होती है, वह पुरुष कहलाता है। चाहे पुरुष हो या स्त्री, वह अन्यों की सेवा करने में रुचि नहीं रखता, प्रत्येक प्राणी अपनी इन्द्रियों को ही तुष्ट करने में रुचि रखता है। किन्तु कृष्णभावनामृत या कृष्णभक्ति प्रत्येक पुरुष या स्त्री को उत्तम कोटि का प्रशिक्षण प्रदान करती है। पुरुष को उत्तमकोटि का कृष्णभक्त बनने और स्त्री को पति की निष्ठावान अनुगामिनी बनने का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। इससे दोनों का जीवन सुखी बनेगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥