श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 52

 
श्लोक
धौतवासा शुचिर्नित्यं सर्वमङ्गलसंयुता ।
पूजयेत्प्रातराशात्प्राग्गोविप्राञ् श्रियमच्युतम् ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
धौत-वासा—धुले वस्त्र पहन कर; शुचि:—शुद्ध होकर; नित्यम्—सदैव; सर्व-मङ्गल—समस्त शुभ सामग्रियों सहित; संयुता—सज्जित होकर; पूजयेत्—पूजा करनी चाहिए; प्रात:-आशात् प्राक्—कलेवा के पूर्व; गो-विप्रान्—गायों तथा ब्राह्मणों; श्रियम्—सम्पत्ति की देवी; अच्युतम्—श्रीभगवान् को ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य को चाहिए कि धुला वस्त्र पहन कर, सदैव शुद्ध रहकर तथा हल्दी, चंदन और अन्य मांगलिक सामग्रियों से अलंकृत होकर कलेवा करने के पूर्व गायों, ब्राह्मणों, ऐश्वर्य की देवी (लक्ष्मी) तथा श्रीभगवान् की पूजा करे।
 
तात्पर्य
 यदि किसी को गायों तथा ब्राह्मणों का सत्कार करने तथा पूजा करने की शिक्षा दे दी जाये तो वह वास्तव में सभ्य बन जाता है। परमेश्वर की पूजा की संस्तुति की जाती है और भगवान् को गाएँ तथा ब्राह्मण अत्यंन्त प्रिय हैं (नमो ब्रह्मण्य-देवाय गो-ब्राह्मणहिताय च)। दूसरे शब्दों में, यह कह सकते हैं, जिस सभ्यता में गायों तथा ब्राह्मणों का आदर नहीं होता उसे धिक्कार है। ब्राह्मणों का गुण प्राप्त किये बिना तथा गायों को सुरक्षा प्रदान किये
बिना कोई आत्मसिद्ध नहीं बन सकता। गो-रक्षा से प्रचुर दुग्ध-सामग्री की निश्चिन्तता आती है और उन्नत सभ्यता के लिए यह परमावश्यक है। गो-मांस खाकर सभ्यता को दूषित नहीं करना चाहिए। जब कोई सभ्यता अग्रसर होती है तभी वह आर्य सभ्यता कहलाती है। मांस के लिए गोवध न करके सभ्य मनुष्यों को उसके दूध से अनेक वस्तुएँ बनाकर समाज की दशा सुधारनी चाहिए। यदि मनुष्य ब्राह्मण-संस्कृति का अनुसरण करे तो वह कृष्णभक्ति में दक्ष हो सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥