श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 61

 
श्लोक
लब्ध्वा तदन्तरं शक्रो निद्रापहृतचेतस: ।
दिते: प्रविष्ट उदरं योगेशो योगमायया ॥ ६१ ॥
 
शब्दार्थ
लब्ध्वा—पाकर; तत्-अन्तरम्—तत्पश्चात्; शक्र:—इन्द्र; निद्रा—नींद से; अपहृत-चेतस:—अचेत; दिते:—दिति के; प्रविष्ट:—घुस गया; उदरम्—गर्भ में; योग-ईश:—योग के स्वामी, योगेश्वर; योग—योग-सिद्धियों की; मायया—शक्ति से ।.
 
अनुवाद
 
 इस त्रुटि को पाकर समस्त योगशक्तियों (योग सिद्धियाँ यथा अणिमा, लघिमा) का स्वामी इन्द्र घोर निद्रा में अचेत दिति के गर्भ में प्रविष्ट हो गया।
 
तात्पर्य
 परम सफल योगी को आठ सिद्धियाँ प्राप्त रहती हैं। इनमें से एक के द्वारा, जिसे अणिमा सिद्धि कहते हैं, वह परमाणु से भी लघु
बन सकता है। उस अवस्था में वह कहीं भी प्रविष्ट हो सकता है। इन्द्र इसी शक्ति से गर्भिणी दिति के भीतर प्रविष्ट हो गया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥