श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 73

 
श्लोक
ततस्तत्परमाश्चर्यं वीक्ष्य व्यवसितं मया ।
महापुरुषपूजाया: सिद्धि: काप्यानुषङ्गिणी ॥ ७३ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तब; तत्—वह; परम-आश्चर्यम्—महान् आश्चर्य; वीक्ष्य—देखकर; व्यवसितम्—यह निश्चय किया गया; मया— मेरे द्वारा; महा-पुरुष—भगवान् विष्णु की; पूजाया:—पूजा का; सिद्धि:—फल; कापि—कुछ; आनुषङ्गिणी— आनुसंगिक, गौण ।.
 
अनुवाद
 
 हे माता! जब मैंने देखा कि उनचासों पुत्र जीवित हैं, तो निश्चित ही मुझे आश्चर्य हुआ। मुझे विश्वास हो गया कि यह आपके द्वारा विष्णु-उपासना के लिए की गई नियमित भक्तिपूर्ण सेवा का ही आनुषंगिक फल है।
 
तात्पर्य
 भगवान् विष्णु की सेवा में संलग्न व्यक्ति के लिए कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। यह वास्तविकता है। भगवद्गीता (१८.७८) में कहा गया है—
यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

“जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुषधारी अर्जुन है, वहीं शाश्वत राजलक्ष्मी, समस्त ऐश्वर्य, विजय, विलक्षण शक्ति तथा नीति है, ऐसा मेरा मत है।” योगेश्वर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, जो अपनी इच्छानुसार जो भी चाहें कर सकते हैं। यह प्राप्ति परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता है। ईश्वर को प्रसन्न कर लेने वाले के लिए कोई भी उपलब्धि आश्चर्यजनक नहीं। उसके लिए सब कुछ सम्भव है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥