श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 78

 
श्लोक
एवं ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
मङ्गलं मरुतां जन्म किं भूय: कथयामि ते ॥ ७८ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; ते—तुमको; सर्वम्—सब कुछ; आख्यातम्—कह सुनाया; यत्—जो; माम्—मुझसे; त्वम्—तुमने; परिपृच्छसि—पूछा; मङ्गलम्—शुभ, कल्याणकारी; मरुताम्—मरुतों का; जन्म—उत्पत्ति; किम्—क्या; भूय:—आगे; कथयामि—कहूँगा; ते—तुम से ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा परीक्षित! मैंने यथासम्भव तुम्हारे द्वारा पूछे गये प्रश्नों, विशेष रूप से मरुतों के इस शुद्ध मंगलकारी वर्णन, का उत्तर दिया। अब तुम आगे जो पूछना चाहते हो पूछो, मैं उसे भी विस्तार से बताऊँगा।
 
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के छठे स्कंध के अन्तर्गत “राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत” नामक अठारहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥