श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 19: पुंसवन व्रत का अनुष्ठान  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीराजोवाच
व्रतं पुंसवनं ब्रह्मन् भवता यदुदीरितम् ।
तस्य वेदितुमिच्छामि येन विष्णु: प्रसीदति ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-राजा उवाच—महाराज परीक्षित ने कहा; व्रतम्—व्रत; पुंसवनम्—पुंसवन नामक; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; भवता— आपके द्वारा; यत्—जो; उदीरितम्—कहा गया है; तस्य—उसका; वेदितुम्—जानना; इच्छामि—चाहता हूँ; येन—जिससे; विष्णु:—भगवान् विष्णु; प्रसीदति—प्रसन्न होते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज परीक्षित ने कहा—हे प्रभो! आप पुंसवन व्रत के सम्बन्ध में पहले ही बता चुके हैं। अब मैं इसके विषय में विस्तार से सुनना चाहता हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि इस व्रत का पालन करके भगवान् विष्णु को प्रसन्न किया जा सकता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥