श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 19: पुंसवन व्रत का अनुष्ठान  »  श्लोक 11

 
श्लोक
युवां तु विश्वस्य विभू जगत: कारणं परम् ।
इयं हि प्रकृति: सूक्ष्मा मायाशक्तिर्दुरत्यया ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
युवाम्—तुम दोनों; तु—निस्सन्देह; विश्वस्य—ब्रह्माण्ड के; विभू—स्वामी; जगत:—जगत के; कारणम्—कारण; परम्—सर्वश्रेष्ठ; इयम्—यह; हि—निश्चय ही; प्रकृति:—शक्ति; सूक्ष्मा—समझने में कठिन; माया-शक्ति:—अन्तरंगा शक्ति; दुरत्यया—पार पाना कठिन है ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान् विष्णु तथा माता लक्ष्मी! आप दोनों समस्त सृष्टि के स्वामी हैं। वास्तव में इस सृष्टि के कारण आप ही हैं। माता लक्ष्मी को समझ पाना अत्यन्त कठिन है क्योंकि वे इतनी शक्तिशाली हैं कि उनकी शक्ति की सीमा का पार पाना कठिन है। माता लक्ष्मी को भौतिक जगत में बहिरंगा शक्ति के रूप में अंकित किया जाता है, परन्तु वास्तव में वे सदैव ईश्वर की अन्तरंगा शक्ति हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥