श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 19: पुंसवन व्रत का अनुष्ठान  »  श्लोक 26-28

 
श्लोक
कन्या च विन्देत समग्रलक्षणं
पतिं त्ववीरा हतकिल्बिषां गतिम् ।
मृतप्रजा जीवसुता धनेश्वरी
सुदुर्भगा सुभगा रूपमग्र्यम् ॥ २६ ॥
विन्देद्विरूपा विरुजा विमुच्यते
य आमयावीन्द्रियकल्यदेहम् ।
एतत्पठन्नभ्युदये च कर्म-
ण्यनन्ततृप्ति: पितृदेवतानाम् ॥ २७ ॥
तुष्टा: प्रयच्छन्ति समस्तकामान्
होमावसाने हुतभुक् श्रीहरिश्च ।
राजन् महन्मरुतां जन्म पुण्यं
दितेर्व्रतं चाभिहितं महत्ते ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
कन्या—अविवाहित लडक़ी; च—तथा; विन्देत—प्राप्त कर सकती है; समग्रलक्षणम्—समस्त अच्छे गुणों वाला; पतिम्—पति को; तु—और; अवीरा—पति या पुत्र रहित स्त्री; हत-किल्बिषाम्—दोषरहित; गतिम्—गन्तव्य; मृत-प्रजा— स्त्री जिसके पुत्र मर चुके हैं; जीव-सुता—दीर्घजीवी पुत्रों वाली; धन-ईश्वरी—धनवान; सु-दुर्भगा—अभागी; सु-भगा— भाग्यवान्; रूपम्—सुन्दरता; अछयम्—श्रेष्ठ; विन्देत्—प्राप्त कर सकती है; विरूपा—कुरुप स्त्री; विरुजा—रोग से; विमुच्यते—मुक्त हो जाती है; य:—जो; आमया-वी—रुग्ण पुरुष; इन्द्रिय-कल्य-देहम्—हृष्ट पुष्ट देह; एतत्—यह; पठन्—सुनाना; अभ्युदये च कर्मणि—तथा यज्ञ में जिसमें पितरों तथा देवों को आहुति दी जाती है; अनन्त—अपार; तृप्ति:—तुष्टि; पितृ-देवतानाम्—पितरों तथा देवताओं के; तुष्टा:—प्रसन्न होकर; प्रयच्छन्ति—प्रदान करते हैं; समस्त— सभी; कामान्—इच्छाएँ; होम-अवसाने—इस अनुष्ठान के पूर्ण हो जाने पर; हुत-भुक्—यज्ञ का भोक्ता; श्री-हरि:— भगवान् विष्णु; च—तथा; राजन्—हे राजा; महत्—महान्; मरुताम्—मरुतों का; जन्म—जन्म; पुण्यम्—पवित्र; दिते:—दिति का; व्रतम्—व्रत; च—भी; अभिहितम्—कहा गया; महत्—महान्; ते—तुमसे ।.
 
अनुवाद
 
 यदि अविवाहित कन्या इस व्रत को रखती है, तो उसे सुन्दर पति मिल सकता है। यदि अवीरा स्त्री (जिसका कोई पति या पुत्र नहीं है) इस अनुष्ठान को करती है, तो उसे वैकुण्ठ जगत को भेजा जा सकता है। जिस स्त्री की संतानें जन्म लेने के बाद मर चुकी हों, उसे दीर्घजीवी सन्तान के साथ ही साथ सम्पत्ति भी प्राप्त होती है। अभागी स्त्री का भाग्य खुल जाता है और कुरूपा स्त्री सुन्दर हो जाती है। इस व्रत को रखने से रोगी पुरुष को रोग से मुक्ति मिल सकती है और कार्य करने के लिए स्वस्थ शरीर प्राप्त हो सकता है। यदि इस कथा को कोई अपने पितरों तथा देवों को आहुति देते समय विशेषतया श्राद्ध-पक्ष में सुनाता तो देवता तथा पितृलोक के वासी उससे अत्यन्त प्रसन्न होंगे और उसकी समस्त इच्छाओं को पूर्ण करते हैं। इस अनुष्ठान के करने से भगवान् विष्णु तथा माता लक्ष्मी उस पर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। हे राजा परीक्षित! मैंने पूरी तरह से बता दिया है कि दिति ने किस प्रकार इस व्रत को किया और उसे श्रेष्ठ पुत्र—मरुत्गण तथा सुखी जीवन—प्राप्त हुए। मैंने तुम्हें यथाशक्ति विस्तार से सुनाने का प्रयत्न किया है।
 
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के छठे स्कंन्ध के अन्तर्गत “पुंसवन व्रत का अनुष्ठान” नामक उन्नीसवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
॥ इति षष्ठ: स्कन्ध: समाप्त: ॥
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥