श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 19: पुंसवन व्रत का अनुष्ठान  »  श्लोक 9

 
श्लोक
श्रियं विष्णुं च वरदावाशिषां प्रभवावुभौ ।
भक्त्या सम्पूजयेन्नित्यं यदीच्छेत्सर्वसम्पद: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
श्रियम्—सौभाग्य की देवी को; विष्णुम्—भगवान् विष्णु को; च—तथा; वर-दौ—वरों को देने वाली; आशिषाम्— आशीर्वादों का; प्रभवौ—साधन; उभौ—दोनों; भक्त्या—भक्ति से; सम्पूजयेत्—पूजे; नित्यम्—प्रतिदिन; यदि—यदि; इच्छेत्—चाहता है; सर्व—समस्त; सम्पद:—ऐश्वर्य ।.
 
अनुवाद
 
 यदि किसी को समस्त ऐश्वर्यों की चाहत है, तो उसका कर्तव्य है कि प्रतिदिन भगवान् विष्णु की पूजा उनकी पत्नी लक्ष्मी सहित करे। उसे परम आदर से उपर्युक्त विधि से उनकी पूजा करनी चाहिए। भगवान् विष्णु तथा ऐश्वर्य की देवी का अत्यन्त शक्तिशाली संयोग है। वे समस्त वरों को देने वाले हैं तथा समस्त सौभाग्य के स्रोत हैं। अत: हर एक का कर्तव्य है कि लक्ष्मी-नारायण की पूजा करे।
 
तात्पर्य
 लक्ष्मी-नारायण अर्थात् भगवान् विष्णु तथा माता लक्ष्मी सबों के हृदय में सदैव विराजमान रहते हैं (ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति)। किन्तु अभक्त लोग यह नहीं समझते कि भगवान् विष्णु अपनी प्रेयसी लक्ष्मी के साथ सबों के हृदयों में स्थित हैं, अत: उन्हें विष्णु का ऐश्वर्य प्राप्त नहीं होता। पाखंडी लोग कभी-कभी दरिद्र मनुष्य को दरिद्रनारायण कहकर पुकारते हैं। यह अत्यन्त अवैज्ञानिक है। भगवान् विष्णु तथा लक्ष्मी सदैव प्रत्येक व्यक्ति
के हृदय में स्थित रहते हैं, विशेष रूप से उनके ह्रदय में जो दरिद्र नहीं हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति नारायण है। नारायण के प्रसंग में इस शब्द का व्यवहार अत्यन्त कुत्सित हैं। भगवान् कभी दरिद्र नहीं बनते, अत: वे कभी दरिद्रनारायण नहीं कहे जा सकते। वे तो सबों के हृदय में विद्यमान हैं, किन्तु वे न तो दरिद्र हैं न धनी। केवल ऐसे धूर्त लोग जो नारायण के ऐश्वर्य को नहीं जानते उन पर दरिद्रता का आघात पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥