श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 13

 
श्लोक
अथैनं मापनयत कृताशेषाघनिष्कृतम् ।
यदसौ भगवन्नाम म्रियमाण: समग्रहीत् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—इसलिए; एनम्—उसको (अजामिल को); मा—मत; अपनयत—ले जाने का प्रयास करो; कृत—पहले किया हुआ; अशेष—असीम; अघ-निष्कृतम्—उसके पापकर्मों के लिए प्रायश्चित्त; यत्—क्योंकि; असौ—उसने; भगवत्- नाम—भगवान् का पवित्र नाम; म्रियमाण:—मरते समय; समग्रहीत्—पूर्णरूपेण उच्चारण किया ।.
 
अनुवाद
 
 इस अजामिल ने मृत्यु के समय असहाय होकर तथा अत्यन्त जोर-जोर से भगवान् नारायण के पवित्र नाम का उच्चारण किया है। एकमात्र उसी उच्चारण ने पूरे पापमय जीवन के फलों से उसे पहले ही मुक्त कर दिया है। इसलिए हे यमराज के सेवको! तुम उसे नारकीय दशाओं में दण्ड देने के लिए अपने स्वामी के पास ले जाने का प्रयास मत करो।
 
तात्पर्य
 विष्णुदूतों ने श्रेष्ठ अधिकारी होने के नाते यमदूतों को आदेश दिया जो यह नहीं जानते थे कि अजामिल को अब उसके विगत पापों के लिए नारकीय जीवन में यातना नहीं दी जानी है। यद्यपि उसने अपने पुत्र के सम्बन्ध में नारायण के पवित्र नाम का उच्चारण किया था, किन्तु पवित्र नाम दिव्य रूप से इतना शक्तिशाली है कि अजामिल स्वत: मुक्त कर दिया गया, क्योंकि उसने मरते समय पवित्र नाम का उच्चारण किया था। (अन्ते नारायण स्मृत:)भगवद्गीता (७.२८) में कृष्ण पुष्टि करते हैं—
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता: ॥

“जिन मनुष्यों ने पूर्वजन्मों में तथा इस जन्म में पुण्यकर्म किये हैं और जिनके पापकर्मों का पूर्णतया उच्छेदन हो चुका है और जो मोह के द्वन्द्वों से मुक्त हो चुके हैं, तब वे संकल्पपूर्वक मेरी सेवा में तत्पर होते हैं।” जब तक कोई सारे पापकर्मों से मुक्त नहीं हो जाता, वह भक्ति के पद तक नहीं उठ सकता। भगवद्गीता में अन्यत्र (८.५) कहा गया है—

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।

य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय: ॥

यदि कोई मृत्यु के समय कृष्ण या नारायण का स्मरण करता है, तो वह निश्चित रूप से तुरन्त ही घर वापस जाने अर्थात् भगवद्धाम जाने का पात्र बन जाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥