श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 18

 
श्लोक
अज्ञानादथवा ज्ञानादुत्तमश्लोकनाम यत् ।
सङ्कीर्तितमघं पुंसो दहेदेधो यथानल: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
अज्ञानात्—अज्ञानवश; अथवा—या; ज्ञानात्—जानकर; उत्तमश्लोक—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का; नाम—पवित्रनाम; यत्—जो; सङ्कीर्तितम्—संकीर्तन किया गया; अघम्—पाप; पुंस:—मनुष्य का; दहेत्—जलाकर क्षार कर देता है; एध:—सूखी घास; यथा—जिस तरह; अनल:—अग्नि ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह अग्नि सूखी घास को जला कर राख कर देती है, उसी तरह भगवन्नाम, चाहे वह जाने-अनजाने में उच्चारण किया गया हो, मनुष्य के पापकर्मों के सभी फलों को निश्चित रूप से जलाकर राख कर देता है।
 
तात्पर्य
 आग अपना काम करती है चाहे उसे कोई अबोध बालक छुये या इसकी शक्ति से परिचित अन्य कोई। उदाहरणार्थ, यदि तिनकों वाले खेत में या सूखी घास में आग लगा दी जाये, चाहे वह किसी ऐसे वृद्ध व्यक्ति द्वारा लगाई जाये जो आग की शक्ति को जानता
है या अज्ञानी बालक द्वारा, घास जलकर राख हो जाएगी। इसी तरह हरे कृष्ण मंत्र के कीर्तन की शक्ति को चाहे कोई जानता हो या न भी जानता हो, किन्तु यदि वह पवित्र नाम का कीर्तन करता है, तो समस्त पापफलों से मुक्त हो जायेगा।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥