श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 2

 
श्लोक
श्रीविष्णुदूता ऊचु:
अहो कष्टं धर्मद‍ृशामधर्म: स्पृशते सभाम् ।
यत्रादण्ड्येष्वपापेषु दण्डो यैर्ध्रियते वृथा ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-विष्णुदूता: ऊचु:—विष्णुदूतों ने कहा; अहो—हाय; कष्टम्—कितना दुखदायी है; धर्म-दृशाम्—धर्मपालन करने में रुचि लेने वाले पुरुषों को; अधर्म:—अधर्म; स्पृशते—प्रभावित कर रहा है; सभाम्—सभा को; यत्र—जिसमें; अदण्ड्येषु—न दण्डित होने वाले पुरुषों पर; अपापेषु—पापरहित; दण्ड:—दण्ड; यै:—जिनके द्वारा; ध्रियते—निर्धारित किया जाता है; वृथा—व्यर्थ ही ।.
 
अनुवाद
 
 विष्णुदूतों ने कहा : हाय! यह कितना दु:खद है कि ऐसी सभा में जहाँ धर्म का पालन होना चाहिए, वहाँ अधर्म को लाया जा रहा है। दरअसल, धार्मिक सिद्धान्तों का पालन करने के अधिकारी जन एक निष्पाप एवं अदण्डनीय व्यक्ति को व्यर्थ ही दण्ड दे रहे हैं।
 
तात्पर्य
 विष्णुदूतों ने यमदूतों पर आरोप लगाया कि वे दण्ड देने के लिए अजामिल को यमराज के पास घसीट कर ले जाने का प्रयास करके धार्मिक सिद्धान्तों का उल्लंघन कर रहे हैं। यमराज वह अधिकारी है, जिसे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने धार्मिक तथा अधार्मिक सिद्धान्तों का निर्णय करने तथा अधार्मिक लोगों को दण्ड देने के लिए नियुक्त किया है। किन्तु यदि पूर्णतया निष्पाप लोग दण्डित होते हैं, तो यमराज की पूरी सभा दूषित होती है। यह नियम न केवल यमराज की सभा पर लागू होता है, अपितु सम्पूर्ण मानव-समाज पर भी लागू होता है।
मानव-समाज में धार्मिक सिद्धान्तों का सही ढंग से पालन करना राजन् के दरबार का या सरकार का कर्तव्य है। दुर्भाग्यवश इस कलियुग में धार्मिक सिद्धान्तों में हस्तक्षेप किया जाता है और सरकार यह ठीक से निर्णय नहीं ले पाती कि कौन दण्डनीय है और कौन नहीं। कहा जाता है कि कलियुग में यदि न्यायालय में धन नहीं व्यय किया जाये तो न्याय नहीं मिल पाता। निस्सन्देह न्यायालयों में प्राय: पाया जाता है कि अनुकूल निर्णयों के लिए मैजिस्ट्रेटों को रिश्वत दी जाती है। कभी-कभी कृष्णभावनामृत-आन्दोलन का प्रचार करने वाले धार्मिक लोगों को बन्दी बनाकर पुलिस तथा न्यायालयों द्वारा सताया जाता है, जो सम्पूर्ण जनता के लाभार्थ कार्य करते हैं। विष्णुदूत, जो कि वैष्णव थे, इन्हीं शोचनीय तथ्यों के लिए शोक कर रहे थे। वैष्णवजन समस्त पतितात्माओं के प्रति अपनी आध्यात्मिक करुणा के कारण धार्मिक सिद्धान्तों की मानक विधि के अनुसार प्रचार करने बाहर जाते हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश, कलियुग के प्रभाव से जिन वैष्णवों ने भगवान् की महिमा का प्रचार करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है वे कभी-कभी सताये जाते हैं और शान्ति भंग करने के झूठे आरोपों पर न्यायालयों द्वारा दण्डित किये जाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥