श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 20

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
त एवं सुविनिर्णीय धर्मं भागवतं नृप ।
तं याम्यपाशान्निर्मुच्य विप्रं मृत्योरमूमुचन् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; ते—वे (विष्णुदूत); एवम्—इस प्रकार; सु-विनिर्णीय—सुनिश्चित करके; धर्मम्—असली धर्म; भागवतम्—भक्ति के रूप में; नृप—हे राजा; तम्—उसको (अजामिल को); याम्य पाशात्—यमदूतों के पाश से; निर्मुच्य—छुड़ाकर; विप्रम्—ब्राह्मण को; मृत्यो:—मृत्यु से; अमूमुचन्—बचा लिया ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजन्! तर्क-वितर्कों द्वारा भक्ति के सिद्धान्तों का पूरी तरह से निर्णय कर चुकने के बाद विष्णु के दूतों ने अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ा दिया और उसे आसन्न मृत्यु से बचा लिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥