श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 26

 
श्लोक
अहो मे परमं कष्टमभूदविजितात्मन: ।
येन विप्लावितं ब्रह्म वृषल्यां जायतात्मना ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
अहो—हाय; मे—मेरी; परमम्—अत्यधिक; कष्टम्—दुखी अवस्था; अभूत्—हो गई; अविजित-आत्मन:—क्योंकि मेरी इन्द्रियाँ अनियंत्रित थीं; येन—जिनके द्वारा; विप्लावितम्—विनष्ट; ब्रह्म—मेरे सारे ब्राह्मणगुण; वृषल्याम्—एक शूद्राणी या दासी से; जायता—उत्पन्न हुए; आत्मना—मेरे द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 अजामिल ने कहा : हाय! अपनी इन्द्रियों का दास बनकर मैं कितना अधम बन गया! मैं अपने सुयोग्य ब्राह्मण पद से नीचे गिर गया और मैंने एक वेश्या के गर्भ से बच्चे उत्पन्न किये।
 
तात्पर्य
 उच्चजाति के लोग—ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य—निम्न जाति की स्त्रियों के गर्भ से सन्तानें उत्पन्न नहीं करते। अत: वैदिक समाज की यह रीति है कि विवाह के लिए लडक़ी तथा लडक़े की कुण्डलियों की जाँच-पड़ताल यह देखने के लिए की जाती है कि उनका संयोग अनुकूल तो है। वैदिक ज्योतिष यह बताता है कि कोई व्यक्ति प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार विप्र वर्ण में, क्षत्रिय वर्ण में, वैश्य वर्ण में या शूद्र वर्ण में उत्पन्न है। इसकी जाँच आवश्यक है, क्योंकि विप्र
वर्ण के बालक तथा शूद्रवर्ण की लडक़ी के साथ विवाह अनमेल होता है। इससे पति तथा पत्नी दोनों ही का विवाहित जीवन दुखमय हो जाता है। अत: लडक़े को उसी वर्ण की लडक़ी के साथ विवाह करना चाहिए। वस्तुत:, यह त्रैगुण्य है—अर्थात् वेदों के अनुसार भौतिक गणना है। किन्तु यदि लडक़ा तथा लडक़ी दोनों ही भक्त हों, तो ऐसे विचारों की आवश्यकता नहीं रह जाती। भक्त दिव्य होता है, अतएव भक्तों के बीच विवाह होने से लडक़े तथा लडक़ी का अत्यन्त सुखी मेल (संयोग) बनता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥