श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 27

 
श्लोक
धिङ्‌मां विगर्हितं सद्भ‍िर्दुष्कृतं कुलकज्जलम् ।
हित्वा बालां सतीं योऽहं सुरापीमसतीमगाम् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
धिक् माम्—मुझे धिक्कार है; विगर्हितम्—निन्दनीय; सद्भि:—ईमानदार व्यक्तियों द्वारा; दुष्कृतम्—पापकर्म करने वाला; कुल-कज्जलम्—जिसने कुल की परम्परा को कलंकित किया हो; हित्वा—त्यागकर; बालाम्—युवा पत्नी को; सतीम्— सती-साध्वी; य:—जो; अहम्—मैंने; सुरापीम्—शराब पीने वाली स्त्री के साथ; असतीम्—असाध्वी; अगाम्—संभोग किया ।.
 
अनुवाद
 
 हाय! मुझे धिक्कार है। मैंने इतना पापपूर्ण कार्य किया है कि अपनी मैने कुल-परम्परा को लज्जित किया है। दरअसल, मैंने शराब पीने वाली पतित वेश्या के साथ संभोग करने के लिए अपनी सती तथा सुन्दर युवा पत्नी को त्याग दिया है। धिक्कार है मुझे।
 
तात्पर्य
 यह उसकी मानसिकता है, जो शुद्ध भक्त बन रहा हो। जब भगवान् तथा गुरु की कृपा से कोई भक्ति-पद को प्राप्त होता है, तो वह पहले अपने विगत पापकर्मों पर पश्चात्ताप करता है। इससे उसे आध्यात्मिक जीवन में आगे बढऩे में सहायता मिलती है। विष्णुदूतों ने अजामिल को शुद्ध भक्त बनने का अवसर प्रदान
किया था और शुद्ध भक्त का कर्तव्य है कि वह अवैध यौन, नशा, मांसाहार तथा जुआ खेलने जैसे अपने विगत पापकर्मों के लिए पश्चात्ताप करे। उसे न केवल अपनी पुरानी गन्दी आदतें त्याग देनी चाहिए, अपितु अपने विगत पापकर्मों के लिए पश्चात्ताप करना चाहिए। शुद्धभक्ति का यही मानक है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥