श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 32

 
श्लोक
अथापि मे दुर्भगस्य विबुधोत्तमदर्शने ।
भवितव्यं मङ्गलेन येनात्मा मे प्रसीदति ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—इसलिए; अपि—यद्यपि; मे—मुझ; दुर्भगस्य—इतने अभागे का; विबुध-उत्तम—उच्च भक्तों का; दर्शने—दर्शन करने से; भवितव्यम्—होगा; मङ्गलेन—शुभ कार्य; येन—जिससे; आत्मा—आत्मा; मे—मेरी; प्रसीदति—वास्तव में सुखी होती है ।.
 
अनुवाद
 
 निश्चय ही मैं अति निन्दनीय तथा अभागा हूँ कि पापकर्मों के समुद्र में डूबा हुआ हूँ, किन्तु फिर भी अपने पूर्व आध्यात्मिक कर्मों के कारण मैं उन चार महापुरुषों का दर्शन कर सका जो मुझे बचाने आये थे। उनके आने से अब मैं अत्यधिक सुखी अनुभव करता हूँ।
 
तात्पर्य
 जैसाकि चैतन्य-चरितामृत (मध्य २२.५४) में कहा गया है—
‘साधु-संग’, ‘साधु-संग’—सर्व-शास्त्रे कय।

लव-मात्र साधु-संगे सर्व-सिद्धि हय ॥

“सभी शास्त्र भक्तों की संगति की संस्तुति करते हैं, क्योंकि एक क्षण की भी ऐसी संगति से सभी सिद्धियों के बीज प्राप्त हो सकते हैं।” अजामिल अपने जीवन के प्रारम्भ में निश्चित रूप से शुद्ध था और वह भक्तों तथा ब्राह्मणों की संगति करता था। अपने उसी पुण्यकर्म के फलस्वरूप पतित होते हुए भी उसे अपने पुत्र का नाम नारायण रखने की प्रेरणा मिली थी। निश्चय ही यह उस नेक सलाह के कारण था, जो उसे अपने भीतर से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा दी गई थी। जैसा कि भगवद्गीता (१५.१५) में भगवान् कहते हैं—सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च—मैं हर व्यक्ति के हृदय के भीतर स्थित हूँ और मुझ से स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति उत्पन्न होते हैं।” प्रत्येक हृदय में स्थित भगवान् इतने दयालु हैं कि यदि किसी ने कभी उनकी सेवा कि हो, तो वे उसे भुलाते नहीं। इस तरह भगवान् ने अजामिल को भीतर से अवसर प्रदान किया कि वह अपने सबसे छोटे पुत्र का नाम नारायण रखे जिससे स्नेहवश वह उसे निरन्तर “नारायण” “नारायण” कहकर पुकारा करे और इस तरह अपनी मृत्यु के समय सबसे भयावह तथा घातक स्थिति से बच सके। कृष्ण की कृपा ऐसी ही होती है। गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति लता-बीज—गुरु तथा कृष्ण की कृपा से मनुष्य को भक्ति का बीज मिलता है। यह संगति भक्त को बड़े से बड़े भय से बचाती है। हम अपने कृष्णभावनामृत-आन्दोलन में भक्त का नाम ऐसे रूप में बदल देते हैं, जो उसे विष्णु का स्मरण कराये। यदि भक्त अपनी मृत्यु के समय अपना ही नाम, यथा कृष्णदास या गोविन्ददास स्मरण कर सके, तो वह महानतम संकट से बच सकता है। इसीलिए दीक्षा के समय नाम-परिवर्तन अति आवश्यक है। कृष्णभावनामृत-आन्दोलन इतना सतर्क है कि यह किसी-न-किसी रूप में कृष्ण का स्मरण करने का सुअवसर प्रदान करता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥