श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 33

 
श्लोक
अन्यथा म्रियमाणस्य नाशुचेर्वृषलीपते: ।
वैकुण्ठनामग्रहणं जिह्वा वक्तुमिहार्हति ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
अन्यथा—अन्यथा, नहीं तो; म्रियमाणस्य—मरणासन्न व्यक्ति का; न—नहीं; अशुचे:—अत्यन्त मलिन; वृषली-पते:— वेश्यागामी; वैकुण्ठ—वैकुण्ठ के भगवान् का; नाम-ग्रहणम्—पवित्र नाम का कीर्तन; जिह्वा—जीभ; वक्तुम्—कहने में; इह—इस स्थिति में; अर्हति—समर्थ है ।.
 
अनुवाद
 
 यदि मैने विगत में भक्ति न की होती तो मुझ मलिन वेश्यागामी को, जो मरणासन्न था किस तरह वैकुण्ठपति के पवित्र नाम का उच्चारण करने का अवसर मिल पाता? निश्चय ही ऐसा सम्भव न हो पाता।
 
तात्पर्य
 वैकुण्ठपति का अर्थ है “आध्यात्मिक लोक के स्वामी” जो वैकुण्ठ नाम से भिन्न नहीं है। अजामिल, जो अब स्वरूपसिद्ध आत्मा था यह समझ सका कि अपने विगत
आध्यात्मिक भक्तिमय कार्यों के कारण ही वह मृत्यु के समय अपनी भयावह स्थिति में वैकुण्ठपति के नाम का उच्चारण करने का अवसर प्राप्त कर सका।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥