श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 36-37

 
श्लोक
विमुच्य तमिमं बन्धमविद्याकामकर्मजम् ।
सर्वभूतसुहृच्छान्तो मैत्र: करुण आत्मवान् ॥ ३६ ॥
मोचये ग्रस्तमात्मानं योषिन्मय्यात्ममायया ।
विक्रीडितो ययैवाहं क्रीडामृग इवाधम: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
विमुच्य—छूटकर; तम्—उससे; इमम्—यह; बन्धम्—बन्धन; अविद्या—अविद्या के कारण; काम—कामेच्छाओं के कारण; कर्म-जम्—कार्यों से उत्पन्न; सर्व-भूत—सारे जीवों का; सुहृत्—मित्र; शान्त:—अत्यन्त शान्त; मैत्र:—मैत्रीपूर्ण; करुण:—दयालु; आत्म-वान्—स्वरूपसिद्ध; मोचये—मैं पाशमुक्त करूँगा; ग्रस्तम्—कसा हुआ; आत्मानम्—मेरी आत्मा; योषित्-मय्या—स्त्री रूप में; आत्म-मायया—भगवान् की मोहिनी शक्ति से; विक्रीडित:—खिलवाड़ करता; यया—जिससे; एव—निश्चय; अहम्—मैं; क्रीडा-मृग:—वशीभूत पशु; इव—सदृश; अधम:—इतना पतित ।.
 
अनुवाद
 
 शरीर से अपनी पहचान बनाने के कारण मनुष्य इन्द्रियतृप्ति के लिए इच्छाओं के अधीन होता है और इस तरह वह अपने को अनेक प्रकार के पवित्र तथा अपवित्र कार्यों में लगाता है। यही भौतिक बन्धन है। अब मैं अपने आपको उस भौतिक बन्धन से छुड़ाऊँगा जो स्त्री के रूप में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की मोहिनी शक्ति द्वारा उत्पन्न किया गया है। सर्वाधिक पतितात्मा होने से मैं माया का शिकार बना और उस नाचने वाले कुत्ते के समान बन गया जो स्त्री के हाथ के इशारे पर चलता है। अब मैं सारी कामेच्छाओं को त्याग दूँगा और इस मोह से अपने को मुक्त कर लूँगा। मैं दयालु एवं समस्त जीवों का शुभैषी मित्र बनूंगा तथा कृष्णभावनामृत में अपने को सदैव लीन रखूँगा।
 
तात्पर्य
 समस्त कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों के लिए संकल्प का यही मानदण्ड होना चाहिए। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को माया के पाश से अपने को छुड़ा लेना चाहिए और ऐसे पाशों से कष्ट पा रहे अन्य सारे लोगों के प्रति दयालु होना चाहिए। कृष्णभावनामृत-आन्दोलन के कार्यकलाप न केवल स्वयं के लिए हैं, अपितु अन्यों के लिए भी हैं। कृष्णभावनामृत की यही पूर्णता है। जो व्यक्ति अपने मोक्ष में ही रुचि रखता है, वह कृष्णभावनामृत में उतना उन्नत
नहीं होता जितना कि अन्यों के प्रति दया अनुभव करने वाला तथा कृष्णभावनामृत-आन्दोलन का प्रसार करने वाला होता है। ऐसा उन्नत भक्त कभी नीचे नहीं गिरेगा, क्योंकि कृष्ण उसे विशेष संरक्षण प्रदान करेंगे। कृष्णभावनामृत-आन्दोलन का यही सार है। हर व्यक्ति माया के हाथों के खिलौने जैसा है और वह उसे जिस तरह घुमाती है, कार्य करता है। मनुष्य को चाहिए कि अपने को तथा अन्यों को इससे छुड़ाने के लिए कृष्णभावनामृत को स्वीकार करे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥