श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 5-6

 
श्लोक
यस्याङ्के शिर आधाय लोक: स्वपिति निर्वृत: ।
स्वयं धर्ममधर्मं वा न हि वेद यथा पशु: ॥ ५ ॥
स कथं न्यर्पितात्मानं कृतमैत्रमचेतनम् ।
विस्रम्भणीयो भूतानां सघृणो दोग्धुमर्हति ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसके; अङ्के—गोद में; शिर:—सिर; आधाय—रखकर; लोक:—आम जनता; स्वपिति—सोती है; निर्वृत:— शान्ति से; स्वयम्—स्वयं; धर्मम्—धार्मिक सिद्धान्त या जीवन-लक्ष्य; अधर्मम्—अधार्मिक सिद्धान्त; वा—अथवा; न— नहीं; हि—निस्सन्देह; वेद—जानते हैं; यथा—जिस तरह; पशु:—पशु; स:—ऐसा व्यक्ति; कथम्—कैसे; न्यर्पित- आत्मानम्—उस जीव के प्रति जिसने पूर्णतया आत्मसमर्पण कर दिया है; कृत-मैत्रम्—श्रद्धा तथा मैत्री से समन्वित; अचेतनम्—अविकसित चेतना वाला, मूर्ख; विस्रम्भणीय:—श्रद्धा का विषय बनने के योग्य; भूतानाम्—जीवों का; स घृण:—सारे लोगों के कल्याण हेतु मृदु हृदय रखने वाला; दोग्धुम्—कष्ट देने के लिए; अर्हति—समर्थ है ।.
 
अनुवाद
 
 सामान्य लोग ज्ञान में इतने उन्नत होते है कि धर्म तथा अधर्म में भेदभाव कर सकें। अबोध, अप्रबुद्ध नागरिक उस अज्ञानी पशु की तरह है, जो अपने स्वामी की गोद में सिर रख कर शान्तिपूर्वक सोता रहता है और श्रद्धापूर्वक अपने स्वामी द्वारा अपने संरक्षण पर विश्वास करता है। यदि नेता वास्तव में दयालु हो तथा जीव की श्रद्धा का भाजन बनने योग्य हो तो वह किसी मूर्ख व्यक्ति को किस तरह दण्ड दे सकता है या जान से मार सकता है, जिसने श्रद्धा तथा मैत्री में पूर्णतया आत्मसमर्पण कर दिया हो?
 
तात्पर्य
 श्रद्धा या विश्वास को तोडऩे वाले को संस्कृत में विश्वस्त-घात द्योतित करता है। जनसमूह को सदैव इसलिए सुरक्षित अनुभव करना चाहिए, क्योंकि उसे सरकारी सुरक्षा प्राप्त रहती है। अतएव कितना खेदजनक है यदि सरकार स्वयं विश्वासघात करे और नागरिकों को राजनीतिक कारणों से कठिनाई में डाल दे। हमने भारत के विभाजन के दिनों में वास्तव में देखा कि यद्यपि हिन्दू तथा मुसलमान शान्तिपूर्वक साथ-साथ रह रहे थे, किन्तु राजनीतिज्ञों के छलकपट से उनके बीच सहसा घृणा की भावना उत्पन्न हो गई और हिन्दुओं तथा मुसलमानों ने राजनीति के कारण एक दूसरे की हत्या कर दी। यह कलियुग का लक्षण है। इस युग में पशुओं को ठीक से आश्रय दिया जाता है और उन्हें पूर्ण विश्वास रहता है कि उनके मालिक उनकी रक्षा करेंगे, किन्तु दुर्भाग्यवश ज्योंही वे तगड़े (मोटे) हो जाते हैं, उन्हें तुरन्त वध के लिए कसाईखाने
भेज दिया जाता है। विष्णुदूत जैसे वैष्णव ऐसी क्रूरता की निन्दा करते हैं। दरअसल, जिन नारकीय दशाओं का पहले वर्णन हो चुका है, वे ऐसी यातना देने वाले पापी मनुष्यों की प्रतीक्षा करती रहती हैं। जो मनुष्य किसी जीव के साथ चाहे यह जीव मनुष्य हो या पशु, विश्वासघात करता है, जिसने अच्छे भाव से उसकी शरण ले रखी है, वह अतीव पापी है। चूँकि अब ऐसे विश्वासघात सरकार द्वारा अदण्डित रहते हैं इसलिए पूरा मानव-समाज बुरी तरह से दूषित है। इसलिए इस युग के लोगों को मन्दा: सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुता:। ऐसी पापमयता के फलस्वरूप लोग निन्दित होते हैं (मन्दा:) उनकी बुद्धि विमल नहीं रहती (सुमन्दमतय:) वे अभागे होते हैं (मन्दभाग्या:), अतएव वे अनेक समस्याओं द्वारा सदैव उद्विग्न रहते हैं (उपद्रुता:)। यह तो इस जीवन में उनकी स्थिति है और मृत्यु के बाद उन्हें नारकीय दण्ड दिया जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥