श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 8

 
श्लोक
एतेनैव ह्यघोनोऽस्य कृतं स्यादघनिष्कृतम् ।
यदा नारायणायेति जगाद चतुरक्षरम् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
एतेन—इस (कीर्तन ) से; एव—निस्सन्देह; हि—निश्चय ही; अघोन:—पापपूर्ण फलों वाला; अस्य—इस (अजामिल) का; कृतम्—किया हुआ; स्यात्—है; अघ—पापों का; निष्कृतम्—पूर्ण प्रायश्चित्त; यदा—जब; नारायण—हे नारायण (उसके पुत्र का नाम); आय—कृपया आइये; इति—इस प्रकार; जगाद—उच्चारण किया; चतु:-अक्षरम्—चार अक्षर (ना-रा-य-ण) ।.
 
अनुवाद
 
 विष्णुदूतों ने आगे कहा : यहाँ तक कि पहले भी, खाते समय तथा अन्य अवसरों पर यह अजामिल अपने पुत्र को यह कहकर पुकारा करता, “प्रिय नारायण! यहाँ तो आओ।” यद्यपि वह अपने पुत्र का नाम पुकारता था, फिर भी वह ना, रा, य तथा ण इन चार अक्षरों का उच्चारण करता था। इस प्रकार केवल नारायण नाम का उच्चारण करने से उसने लाखों जन्मों के पापपूर्ण फलों के लिए पर्याप्त प्रायश्चित्त कर लिए हैं।
 
तात्पर्य
 पहले जब अजामिल अपने परिवार के पालन हेतु पापकर्मों में लगा रहता तो वह नारायण का नाम निरपराध होकर लेता था। केवल अपने पापकर्मों के निवारणार्थ भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करना या पवित्र नाम के कीर्तन के बल पर पापकर्म करना अपराधमय है (नाम्नो बलादस्य हि पाप बुद्धि:)। यद्यपि अजामिल पापकर्मों में लगा रहता था, किन्तु इनके निवारणार्थ उसने कभी नारायण के पवित्र नाम का कीर्तन नहीं किया। वह अपने पुत्र को बुलाने के लिए नारायण का नाम लिया करता था। इसलिए उसका कीर्तन प्रभावोत्पादक था। इस तरह से नारायण के पवित्र नाम का कीर्तन करने से वह अनेकानेक
जीवनों के संचित पापमय फलों को पहले ही विनष्ट कर चुका था। प्रारम्भ में वह पवित्र था, किन्तु बाद में चाहे उसने अनेक पापकर्म किये; फिर भी वह अपराधरहित था, क्योंकि उसने उनके निवारणार्थ कभी नारायण के पवित्र नाम का कीर्तन नहीं किया था। जो व्यक्ति बिना अपराध के भगवन्नाम का सदैव कीर्तन करता है, वह सदैव पवित्र रहता है। जैसाकि इस श्लोक में पुष्टि हुई है अजामिल पहले से निष्पाप था और चूँकि वह नारायण के नाम का उच्चारण करता था, अतएव वह निष्पाप बना रहा। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ा कि वह अपने पुत्र को बुलाता था। नाम स्वयं में प्रभावकारी था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥