श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 9-10

 
श्लोक
स्तेन: सुरापो मित्रध्रुग् ब्रह्महा गुरुतल्पग: ।
स्त्रीराजपितृगोहन्ता ये च पातकिनोऽपरे ॥ ९ ॥
सर्वेषामप्यघवतामिदमेव सुनिष्कृतम् ।
नामव्याहरणं विष्णोर्यतस्तद्विषया मति: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
स्तेन:—चुराने वाला; सुरा-प:—शराबी; मित्र-ध्रुक्—अपने मित्र या सम्बन्धी का विरोधी; ब्रह्म-हा—ब्राह्मण का वध करने वाला; गुरु-तल्प-ग:—अपने गुरु की पत्नी के साथ संभोग करने वाला; स्त्री—स्त्रियाँ; राज—राजा; पितृ—पिता; गो—गौवों का; हन्ता—हत्यारा; ये—जो; च—भी; पातकिन:—पापकर्मे किए; अपरे—अन्य सारे; सर्वेषाम्—उन सबका; अपि—भी; अघ-वताम्—अनेक पाप कर चुके व्यक्ति; इदम्—यह; एव—निश्चय ही; सु-निष्कृतम्—पूर्ण प्रायश्चित्त; नाम-व्याहरणम्—नाम का कीर्तन; विष्णो:—भगवान् विष्णु के; यत:—जिससे; तत्-विषया—पवित्र नाम का उच्चारण करने वाले पर; मति:—उनका ध्यान ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् विष्णु के नाम का कीर्तन सोना या अन्य मूल्यवान वस्तुओं के चोर, शराबी, मित्र या सम्बन्धी के साथ विश्वासघात करने वाले, ब्राह्मण के हत्यारे अथवा अपने गुरु अथवा अन्य श्रेष्ठजन की पत्नी के साथ संभोग करने वाले के लिए प्रायश्चित्त की सर्वोत्तम विधि है। स्त्रियों, राजा या अपने पिता के हत्यारे, गौवों का वध करने वाले तथा अन्य सारे पापी लोगों के लिए भी प्रायश्चित्त की यही सर्वोत्तम विधि है। भगवान् विष्णु के पवित्र नाम का केवल कीर्तन करने से ऐसे पापी व्यक्ति भगवान् का ध्यान आकृष्ट कर सकते हैं और वे इसीलिए विचार करते हैं कि, “इस व्यक्ति ने मेरे नाम का उच्चारण किया है, इसलिए मेरा कर्तव्य है कि उसे सुरक्षा प्रदान करूँ।”
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥