श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीराजोवाच
निशम्य देव: स्वभटोपवर्णितं
प्रत्याह किं तानपि धर्मराज: ।
एवं हताज्ञो विहतान्मुरारे-
र्नैदेशिकैर्यस्य वशे जनोऽयम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-राजा उवाच—राजा ने कहा; निशम्य—सुनकर; देव:—यमराज; स्व-भट—अपने सेवकों का; उपवर्णितम्—कथन; प्रत्याह—उत्तर दिया; किम्—क्या; तान्—उनको; अपि—भी; धर्म-राज:—यमराज, जो मृत्यु के अधीक्षक तथा धार्मिक एवं अधार्मिक कार्यों के निर्णायक हैं; एवम्—इस प्रकार; हत-आज्ञ:—जिनका आदेश व्यर्थ हो चुका था; विहतान्—जो पराजित किये गये थे; मुरारे: नैदेशिकै:—मुरारी अर्थात् कृष्ण के दूतों द्वारा; यस्य—जिसके; वशे—अधीन; जन: अयम्— संसार के सारे लोग ।.
 
अनुवाद
 
 राजा परीक्षित ने कहा : हे प्रभु, हे शुकदेव गोस्वामी! यमराज सारे जीवों के धार्मिक तथा अधार्मिक कार्यों के नियंत्रक हैं, लेकिन उनका आदेश व्यर्थ कर दिया गया है। जब उनके सेवकों अर्थात् यमदूतों ने उनसे विष्णुदूतों द्वारा अपनी पराजय की जानकारी दी जिन्होंने उन्हें अजामिल को बन्दी बनाने से रोका था, तो यमराज ने क्या उत्तर दिया?
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि यद्यपि यमदूतों के कथन वैदिक सिद्धान्तों के द्वारा
पूर्णतया अनुमोदित थे, किन्तु विष्णुदूतों के कथन विजयी रहे। इसकी पुष्टि स्वयं यमराज ने की।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥