श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 10

 
श्लोक
तांस्ते वेदितुमिच्छामो यदि नो मन्यसे क्षमम् ।
नारायणेत्यभिहिते मा भैरित्याययुर्द्रुतम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
तान्—उनके विषय में; ते—आप से; वेदितुम्—जानने के लिए; इच्छाम:—हम चाहते हैं; यदि—यदि; न:—हमारे लिए; मन्यसे—आप सोचते हैं; क्षमम्—उपयुक्त; नारायण—नारायण; इति—इस प्रकार; अभिहिते—उच्चारण किया गया; मा—नहीं; भै:—डरो; इति—इस प्रकार; आययु:—वे आये; द्रुतम्—बहुत शीघ्र ।.
 
अनुवाद
 
 ज्योंही पापी अजामिल ने नारायण नाम का उच्चारण किया, ये चारों सुन्दर व्यक्ति तुरन्त वहाँ आ गये और यह कहकर उसे पुन: आश्वस्त किया, “डरो मत। मत डरो।” हम आपसे उनके विषय में जानना चाहते हैं। यदि आप यह सोचते हैं कि हम उनके विषय में जान सकते हैं, तो कृपा करके बताइये कि वे कौन हैं।
 
तात्पर्य
 यमराज के दूत चारों विष्णुदूतों से पराजित होने से अत्यधिक खिन्न थे और वे उन्हें यमराज के समक्ष लाना चाहते थे तथा यदि सम्भव हो तो उन्हें दण्ड देना चाहते थे। अन्यथा
वे आत्महत्या करना चाह रहे थे। किन्तु इनमें से कोई रास्ता अपनाने के पूर्व वे यमराज से विष्णुदूतों के विषय में जान लेना चाहते थे, क्योंकि वे भी सर्वज्ञ हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥