श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 11

 
श्लोक
श्रीबादरायणिरुवाच
इति देव: स आपृष्ट: प्रजासंयमनो यम: ।
प्रीत: स्वदूतान्प्रत्याह स्मरन् पादाम्बुजं हरे: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-बादरायणि: उवाच—शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति—इस प्रकार; देव:—देवता; स:—वह; आपृष्ट:—पूछे जाने पर; प्रजा-संयमन: यम:—यमराज, जो जीवों पर नियंत्रण रखते हैं; प्रीत:—प्रसन्न होकर; स्व-दूतान्—अपने सेवकों को; प्रत्याह—उत्तर दिया; स्मरन्—स्मरण करते हुए; पाद-अम्बुजम्—चरणकमलों को; हरे:—भगवान् हरि के ।.
 
अनुवाद
 
 श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार पूछे जाने पर जीवों के परम नियन्ता यमराज अपने दूतों से नारायण का पवित्र नाम सुनकर उन पर परम प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान् के चरणकमलों का स्मरण किया और उत्तर देना शुरू किया।
 
तात्पर्य
 जीवों के शुभ तथा अशुभ कर्मों के परम नियन्ता श्रील यमराज अपने सेवकों पर अत्यधिक प्रसन्न हुए, क्योंकि उन्होंने उनके राज्य में नारायण के पवित्र नाम का उच्चारण किया था। यमराज को ऐसे
लोगों से पाला पड़ता है, जो निरे पापी होते हैं और नारायण को नहीं समझ पाते हैं। फलस्वरूप जब दूतों ने नारायण का नाम लिया तो यमराज अत्यधिक प्रसन्न हुए, क्योंकि वे भी एक वैष्णव हैं।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥