श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 13

 
श्लोक
यो नामभिर्वाचि जनं निजायां
बध्नाति तन्‍त्र्यामिव दामभिर्गा: ।
यस्मै बलिं त इमे नामकर्म-
निबन्धबद्धाश्चकिता वहन्ति ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; नामभि:—विभिन्न नामों से; वाचि—वैदिक भाषा में; जनम्—सारे लोगों को; निजायाम्—जो स्वयं उनसे उद्भूत है; बध्नाति—बाँधता है; तन्त्र्याम्—रस्सी को; इव—सदृश; दामभि:—रस्सी से; गा:—बैल; यस्मै—जिसको; बलिम्—कर की छोटी सी भेंट; ते—वे सभी; इमे—इन; नाम-कर्म—नामों तथा विभिन्न कार्यों का; निबन्ध—कृतज्ञता से; बद्धा:—बँधा हुआ; चकिता:—भयभीत; वहन्ति—ढोते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह बैलगाड़ी का चालक अपने बैलों को वश में करने के लिए उनके नथुनों से निकालकर रस्सियाँ (नाथ) बाँध देता है उसी तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सारे व्यक्तियों को वेदों में कहे अपने वचनों रूपी रस्सियों (नाथ) के द्वारा बाँधते हैं, जो मानव समाज के विभिन्न वर्णों के नामों तथा कार्यों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) को निर्धारित करते हैं। इन वर्णों के लोग भयवश परम भगवान् की पूजा अपने-अपने कर्मों के अनुसार भेंटें अर्पित करते हुए करते हैं।
 
तात्पर्य
 इस भौतिक जगत में हर प्राणी, चाहे वह जो कुछ हो, बद्ध है। चाहे वह मनुष्य हो, देवता हो पशु, वृक्ष या पौधा हो, हर वस्तु प्रकृति के नियमों द्वारा नियंत्रित होता है और इस प्राकृतिक नियंत्रण के पीछे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रहते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता द्वारा (९.१०) होती है, जिसमें कृष्ण कहते हैं मयाध्यक्षेणे प्रकृति: सूयते सचराचरम्—भौतिक प्रकृति मेरे निर्देशन के अनुसार कार्य कर रही है और समस्त चर तथा अचर प्राणियों को उत्पन्न करती है। इस तरह कृष्ण उस प्राकृतिक यंत्र के पीछे रहते हैं, जो उनके नियंत्रण में कार्य करता है।
अन्य जीवों से पृथक्, मनुष्य शरीर के रूप में जो जीव है, वह वर्ण तथा आश्रम विभागों के रूप में वैदिक आदेशों द्वारा सुसम्बद्ध रूप से नियंत्रित होता है। मनुष्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह वर्ण तथा आश्रम के विधि-विधानों का पालन करेगा अन्यथा वह यमराज के दण्ड से बच कर नहीं निकल सकता। बात यह है कि हर मनुष्य से यही आशा की जाती है कि वह परम बुद्धिमान व्यक्ति, ब्राह्मण के पद तक स्वयं को ऊपर उठाये और तब उस पद के आगे निकल करके वैष्णव बने। यही जीवन सिद्धि है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र अपने अपने कर्मों के अनुसार भगवान् की पूजा द्वारा अपने को ऊपर उठा सकते हैं। (स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:)। वर्ण तथा आश्रम का विभाजन हर एक के द्वारा कार्यों की सही-सही निष्पादन तथा शान्तिपूर्ण अस्तित्त्व को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। किन्तु हर एक को निर्देश दिया जाता है कि वह सर्वव्यापी परमेश्वर की पूजा करे (येन सर्वम् इदं ततम्)। परमेश्वर ताने-बाने में (ओतं प्रोतम्) स्थित हैं, अतएव यदि कोई अपनी शक्ति के अनुसार परमेश्वर की पूजा करते हुए वैदिक आदेशों का पालन करता है, तो उसका जीवन परिपूर्ण होगा। जैसाकि श्रीमद्भागवत (१.२.१३) में कहा गया है—

अत: पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागश:।

स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम् ॥

“हे द्विजश्रेष्ठ! अतएव यह निष्कर्ष निकला कि मनुष्य जाति-भेद तथा आश्रम के अनुसार नियत कर्तव्यों (धर्म) को सम्पन्न करके जिस सर्वोच्च सिद्धि जो कि भगवान् हरि को प्रसन्न करना है, प्राप्त कर सकता है।” वर्णाश्रम संस्थान मनुष्य को भगवद्धाम वापस जाने का पात्र बनाने के लिए पूर्ण विधि उपलब्ध करता है, क्योंकि प्रत्येक वर्ण तथा आश्रम का उद्देश्य भगवान् को प्रसन्न करना है। मनुष्य प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में परम भगवान् को प्रसन्न कर सकता है और यदि वह ऐसा करता है, तो उसका जीवन पूर्ण है। परम भगवान् पूजनीय हैं और हर व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रीति से उनकी पूजा करता है। जो लोग उनकी प्रत्यक्ष पूजा करते हैं उन्हें मुक्ति-लाभ जल्दी हो जाता है, जबकि अप्रत्यक्ष रीति से सेवा करने वाले की मुक्ति विलम्बित होती है।

नामभिर्वाचि शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। वर्णाश्रम संस्थान में विभिन्न नाम हैं—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यासी। वाक् अथवा वैदिक आदेश इन सारे विभागों के लिए निर्देश देते हैं। हर व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर को नमस्कार करे और वेदों में जिस तरह दर्शाया गया है, अपने कर्तव्य पूरे करे।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥