श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 17

 
श्लोक
तस्यात्मतन्त्रस्य हरेरधीशितु:
परस्य मायाधिपतेर्महात्मन: ।
प्रायेण दूता इह वै मनोहरा-
श्चरन्ति तद्रूपगुणस्वभावा: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसका; आत्म-तन्त्रस्य—आत्मनिर्भर, किसी अन्य व्यक्ति पर आश्रित नहीं; हरे:—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का; अधीशितु:—प्रत्येक वस्तु का स्वामी; परस्य—ब्रह्मा का; माया-अधिपते:—माया के स्वामी; महा-आत्मन:—सर्वश्रेष्ठ चेतन आत्मा; प्रायेण—प्राय:; दूता:—दूत; इह—इस जगत में; वै—निस्सन्देह; मनोहरा:—बर्ताव तथा शारीरिक स्वरूप में सुहावना; चरन्ति—चलते फिरते हैं; तत्—उसका; रूप—शारीरिक रूप वाला; गुण—दिव्य गुण; स्वभावा:—तथा स्वभाव ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् आत्म-निर्भर तथा पूरी तरह स्वतंत्र हैं। वे माया समेत हर एक के स्वामी हैं। वे रूप, गुण तथा स्वभाव से युक्त हैं और इसी तरह उनके आदेशपालक, अर्थात् वैष्णव, जो अत्यन्त सुन्दर होते हैं, उन्हीं जैसे ही शारीरिक स्वरूप दिव्य गुण तथा दिव्य स्वभाव से युक्त होते हैं। वे इस जगत में पूर्ण स्वतंत्रता के साथ सदैव विचरण करते हैं।
 
तात्पर्य
 यमराज परम नियन्ता पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का वर्णन कर रहे थे, किन्तु यमराज के दूत विष्णुदूतों के विषय में जानने के लिए अत्यधिक उत्सुक थे, जिन्होंने अजामिल से सम्बन्धित मुठभेड़ में उन्हें हरा दिया था। इसलिए यमराज ने कहा कि विष्णुदूत अपने शारीरिक रूप, दिव्य गुणों तथा स्वभाव में भगवान् के सदृश हैं। दूसरे
शब्दों में, विष्णुदूत या वैष्णव प्राय: परम भगवान् जितने ही योग्य होते हैं। यमराज ने यमदूतों को सूचित किया कि विष्णुदूत भगवान् विष्णु से कम शक्तिशाली नहीं हैं। चूँकि विष्णु यमराज से ऊपर हैं, इसलिए विष्णुदूत यमदूतों के ऊपर हैं। अत: विष्णुदूतों द्वारा रक्षित व्यक्तियों को यमदूत छू तक नहीं सकते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥