श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 18

 
श्लोक
भूतानि विष्णो: सुरपूजितानि
दुर्दर्शलिङ्गानि महाद्भ‍ुतानि ।
रक्षन्ति तद्भ‍‌क्तिमत: परेभ्यो
मत्तश्च मर्त्यानथ सर्वतश्च ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
भूतानि—जीव या सेवक; विष्णो:—विष्णु के; सुर-पूजितानि—देवताओं द्वारा पूजित; दुर्दर्श-लिङ्गानि—सरलता से न दिखने वाले रूपों वाले; महा-अद्भुतानि—अत्यन्त अद्भुत; रक्षन्ति—वे रक्षा करते हैं; तत्-भक्ति-मत:—भगवान् के भक्त; परेभ्य:—अन्यों से, जो शत्रुता रखते हैं; मत्त:—मुझ (यमराज) से तथा मेरे दूतों से; च—तथा; मर्त्यान्—मनुष्यों को; अथ—इस प्रकार; सर्वत:—हर वस्तु से; च—तथा ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् विष्णु के दूत, जिनकी पूजा देवता भी किया करते हैं, विष्णु जैसे ही अद्भुत शारीरिक लक्षणों से युक्त होते हैं और विरले ही दिखाई देते हैं। ये विष्णुदूत भगवद्भक्तों की रक्षा उनके शत्रुओं, ईर्ष्यालु व्यक्तियों और मेरे अधिकार क्षेत्र के साथ ही साथ प्राकृतिक उत्पातों से भी करते हैं।
 
तात्पर्य
 यमराज ने विष्णुदूतों के गुणों का विशेष रूप से वर्णन अपने सेवकों को आश्वस्त करने के लिए किया है, जिससे वे उनसे ईर्ष्या न करें। यमराज ने यमदूतों को आगाह किया कि विष्णुदूतों की देवताओं द्वारा आदरपूर्वक पूजा की जाती है और वे भगवद्भक्तों को शत्रुओं के हाथों से, प्राकृतिक उत्पातों से तथा इस जगत में सारी संकटपूर्ण स्थितियों से बचाने के प्रति सदैव सतर्क रहते हैं। कभी-कभी कृष्णभावनामृत-संघ के सदस्य विश्वयुद्ध के आसन्न संकट से भयभीत रहते हैं और पूछते हैं कि यदि युद्ध हुआ तो उनका क्या होगा। उन्हें सभी प्रकार के संकट में विष्णुदूतों द्वारा या पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त
रहना चाहिए जैसा कि भगवद्गीता में पुष्टि की गई है (कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति)। भौतिक संकट भक्तों के लिए नहीं होता। इसकी भी पुष्टि श्रीमद्भागवत द्वारा होती है। पदं पदं यद् विपदां न तेषाम्—इस जगत में पग पग पर संकट हैं, किन्तु वे उन भक्तों के लिए नहीं होते जिन्होंने भगवान् के चरणकमलों में पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया है। भगवान् विष्णु के शुद्ध भक्तों को भगवान् के संरक्षण पर पूरी तरह आश्वस्त हो जाना चाहिए और जब तक वे इस भौतिक जगत में हैं, उन्हें चाहिए कि श्री चैतन्य महाप्रभु तथा कृष्ण के सम्प्रदाय अर्थात् कृष्णभावनामृत के हरे कृष्ण आन्दोलन का प्रचार करके पूरी तरह भक्ति में लगे रहें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥