श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 19

 
श्लोक
धर्मं तु साक्षाद्भ‍गवत्प्रणीतं
न वै विदुऋर्षयो नापि देवा: ।
न सिद्धमुख्या असुरा मनुष्या:
कुतो नु विद्याधरचारणादय: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
धर्मम्—असली धार्मिक सिद्धान्त या धर्म के प्रामाणिक नियम; तु—लेकिन; साक्षात्—प्रत्यक्षत:; भगवत्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा; प्रणीतम्—निर्मित; न—नहीं; वै—निस्सन्देह; विदु:—वे जानते हैं; ऋषय:—भृगु जैसे महान् ऋषि; न— नहीं; अपि—भी; देवा:—देवता; न—नहीं; सिद्ध-मुख्या:—सिद्धलोक के मुख्य नेता; असुरा:—असुरगण; मनुष्या:— भूर्लोक के निवासी; कुत:—कहाँ; नु—निस्सन्देह; विद्याधर—विद्याधर नामक कनिष्ठ देवता; चारण—उन लोकों के निवासी जहाँ के लोग स्वभाव से महान् संगीतकार होते हैं; आदय:—इत्यादि ।.
 
अनुवाद
 
 असली धार्मिक सिद्धान्तों का निर्माण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा किया जाता है। पूर्णतया सतोगुणी महान् ऋषि तक भी, जो सर्वोच्च लोकों में स्थान पाये हुए हैं, वे भी असली धार्मिक सिद्धान्तों को सुनिश्चित नहीं कर सकते, न ही देवतागण, न सिद्धलोक के नामक ही कर सकते हैं, तो असुरों, सामान्य मनुष्यों, विद्याधरों तथा चारणों की कौन कहे?
 
तात्पर्य
 जब विष्णुदूतों ने यमदूतों को धर्म के सिद्धान्तों का वर्णन करने के लिए ललकारा तो उन्होंने बतलाया—वेद प्रणिहितो धर्म:—धार्मिक सिद्धान्त वैदिक वाङ्मय में निर्मित सिद्धान्त हैं।
किन्तु उन्हें यह ज्ञात न था कि वैदिक वाङ्मय में कर्मकाण्ड हैं, जो दिव्य नहीं है, अपितु भौतिक जगत में भौतिकतावादी व्यक्तियों के बीच शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने के निमित्त हैं। असली धार्मिक सिद्धान्त तो निस्त्रैगुण्य हैं अर्थात् तीनों गुणों से परे या अलौकिक हैं। यमदूत इन अलौकिक धार्मिक सिद्धान्तों को नहीं जानते थे, अत: जब उन्हें अजामिल को बन्दी बनाने से रोका गया तो उन्हें आश्चर्य हुआ। ऐसे भौतिकतावादी लोगों का जो अपनी सारी श्रद्धा वैदिक कर्मकाण्ड में रखते हैं, वर्णन भगवद्गीता (२.४२) में किया गया है, जिसमें कृष्ण कहते हैं—वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन:—वेदों के समर्थक तथाकथित अनुयायी कहते हैं कि वैदिक अनुष्ठानों से बढक़र कुछ भी नहीं है। निस्सन्देह, भारतवर्ष में लोगों का एक समुदाय ऐसा है, जो वैदिक कर्मकाण्ड का अतीव प्रेमी है, किन्तु वह इन कर्मकाण्डों का अर्थ नहीं समझता जो मनुष्य को क्रमश: कृष्ण को जानने के दिव्य पद तक ऊपर उठाने के लिए हैं (वेदैश्च सर्वेरहमेव वेद्य:)। जो लोग इस सिद्धान्त को नहीं जानते, किन्तु वैदिक कर्मकाण्ड के प्रति श्रद्धालु बने रहते हैं, वे वेदवादरता: कहलाते हैं।

यहाँ पर कहा गया है कि असली धार्मिक सिद्धान्त तो वह है, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा प्रदत्त होता है। इस सिद्धान्त का कथन भगवद्गीता में हुआ है। सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज—मनुष्य को अन्य सारे कर्तव्यों को छोड़ देना चाहिए और कृष्ण के चरणकमलों में शरण लेनी चाहिए। यही असली धार्मिक सिद्धान्त है, जिसका पालन हर एक को करना चाहिए। वैदिक शास्त्रों का पालन करने वाला भी, हो सकता है, इस अलौकिक सिद्धान्त से परिचित न हो, क्योंकि उच्चलोक के देवतागण तक इससे अवगत नहीं हैं। इस दिव्य धार्मिक सिद्धान्त को सीधे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से या उनके विशेष प्रतिनिधि से समझना होगा, जैसाकि अगले श्लोकों में बतलाया गया है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥