श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 20-21

 
श्लोक
स्वयम्भूर्नारद: शम्भु: कुमार: कपिलो मनु: ।
प्रह्लादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम् ॥ २० ॥
द्वादशैते विजानीमो धर्मं भागवतं भटा: ।
गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधं यं ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
स्वयम्भू:—ब्रह्मा; नारद:—महान् सन्त नारद; शम्भु:—शिवजी; कुमार:—चार कुमार; कपिल:—कपिल; मनु:— स्वायम्भुव मनु; प्रह्लाद:—प्रह्लाद महाराज; जनक:—जनक महाराज; भीष्म:—भीष्म पितामह; बलि:—बलि महाराज; वैयासकि:—व्यासदेव के पुत्र शुकदेव; वयम्—हम; द्वादश—बारह; एते—ये; विजानीम:—जानते हैं; धर्मम्—असली धार्मिक सिद्धान्तों को; भागवतम्—जो यह शिक्षा देता है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से किस तरह प्रेम किया जाये; भटा:—हे सेवको; गुह्यम्—अत्यन्त गोपनीय; विशुद्धम्—अलौकिक, भौतिक गुणों से दूषित नहीं; दुर्बोधम्—आसानी से समझ में न आने वाला; यम्—जिसको; ज्ञात्वा—जानकर; अमृतम्—शाश्वत जीवन; अश्नुते—भोग करता है ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्माजी, भगवान् नारद, शिवजी, चार कुमार, भगवान् कपिल (देवहूति के पुत्र), स्वायंभुव मनु, प्रह्लाद महाराज, जनक महाराज, भीष्म पितामह, बलि महाराज, शुकदेव गोस्वामी तथा मैं असली धर्म के सिद्धान्त को जानने वाले हैं। हे सेवको! यह अलौकिक धार्मिक सिद्धान्त, जो भागवत धर्म या परम भगवान् की शरणागति तथा भगवत्प्रेम कहलाता है, प्रकृति के तीनों गुणों से अकलुषित है। यह अत्यन्त गोपनीय है और सामान्य मनुष्य के लिए दुर्बोध है, किन्तु संयोगवश यदि कोई भाग्यवान् इसे समझ लेता है, तो वह तुरन्त मुक्त हो जाता है और इस तरह भगवद्धाम लौट जाता है।
 
तात्पर्य
 भगवान् कृष्ण ने भगवद्गीता में भागवत धर्म को अत्यन्त गोपनीय धार्मिक सिद्धान्त कहा है (सर्वगुह्यतमम् गुह्याद् गुह्यतरम्)। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, “चूँकि तुम मेरे मित्र हो इसलिए मैं तुम्हें परम गोपनीय धर्म बतला रहा हूँ।” सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज—अन्य सारे कर्तव्यों को त्याग दो और मेरी शरण में आओ। कोई यह पूछ सकता है, “यदि यह सिद्धान्त विरले ही समझ सकते हैं, तो फिर इसका लाभ क्या है? इसके उत्तर में यहाँ पर यमराज कहते हैं कि यह धार्मिक सिद्धान्त तभी ज्ञेय है जब कोई ब्रह्मा, शिव, चार कुमारों तथा अन्य प्रामाणिक अधिकारियों की परम्परा का पालन करता है। शिष्य परम्पराएँ चार हैं—एक ब्रह्मा से, एक शिव से, एक लक्ष्मी से तथा एक कुमारों से चलने वाली। ब्रह्मा से चलने वाली शिष्य-परम्परा ब्रह्म सम्प्रदाय कहलाती है, शिव (शम्भु) से चलने वाली परम्परा रुद्र-सम्प्रदाय
तथा देवी लक्ष्मी से चलने वाली परम्परा श्रीसम्प्रदाय तथा कुमारों से चलने वाली कुमार-सम्प्रदाय कहलाती है। मनुष्य को अत्यन्त गोपनीय धार्मिक प्रणाली को समझने के लिए इन चार सम्प्रदायों में से किसी एक की शरण ग्रहण करनी होती है। पद्मपुराण में कहा गया है कि सम्प्रदायविहीना ये मन्त्रास्ते निष्फला मता:—यदि कोई इन चार मान्यताप्राप्त शिष्य-परम्पराओं का पालन नहीं करता तो उसका मंत्र या उसकी दीक्षा निष्फल है। वर्तमान समय में कई अप-सम्प्रदाय हैं अर्थात् ऐसे सम्प्रदाय जो प्रामाणिक नहीं हैं और जिनका ब्रह्मा, शिव, कुमारगण या लक्ष्मी जैसे महाजनों से कोई सम्बन्ध नहीं है। लोग ऐसे सम्प्रदायों से भ्रमित होते हैं। शास्त्रों का कहना है कि ऐसे सम्प्रदाय में दीक्षित होना समय का अपव्यय है, क्योंकि इससे मनुष्य को असली धार्मिक सिद्धान्तों को समझने में मदद नहीं मिलेगी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥